भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2079

इससे लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंके शरीर लहूलुहान हो गये। रणभूमिमें वे दोनों वीर फूले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे॥ ३७ ॥

उन दोनों धनुर्धर वीरोंके मनमें विजय पानेके लिये दृढ़ संकल्प था, अतः वे आपसमें भिड़कर एक-दूसरेके सभी अङ्गोंको भयंकर बाणोंका निशाना बनाने लगे॥ ३८ ॥

इसी बीचमें समरोचित क्रोधसे युक्त हुए रावणकुमारने विभीषणके सुन्दर मुखपर तीन बाणोंका प्रहार किया॥ ३९ ॥

जिनके अग्रभागमें लोहेके फल लगे हुए थे, ऐसे तीन बाणोंसे राक्षसराज विभीषणको घायल करके इन्द्रजित्ने उन सभी वानर-यूथपतियोंपर एक-एक बाणका प्रहार किया॥ ४० ॥

इससे महातेजस्वी विभीषणको उसपर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी गदासे उस दुरात्मा रावणकुमारके चारों घोड़ोंको मार डाला॥ ४१ ॥

जिसका सारथि पहले ही मारा जा चुका था और अब घोड़े भी मार डाले गये, उस रथसे नीचे कूदकर महातेजस्वी इन्द्रजित्ने अपने चाचापर शक्तिका प्रहार किया॥ ४२ ॥

उस शक्तिको आती देख सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे काट डाला और दस टुकड़े करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले विभीषणने जिसके घोड़े मारे गये थे, उस इन्द्रजित्पर कुपित हो उसकी छातीमें पाँच बाण मारे, जिनका स्पर्श वज्रके समान दुःसह था॥ ४४ ॥

सुनहरे पङ्खोंसे सुशोभित और लक्ष्यतक पहुँचनेवाले वे बाण इन्द्रजित्के शरीरको विदीर्ण करके उसके रक्तमें सन गये और लाल रंगके बड़े-बड़े सर्पोंके समान दिखायी देने लगे॥ ४५ ॥

तब महाबली इन्द्रजित्के मनमें अपने चाचाके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उसने राक्षसोंके बीचमें यमराजका दिया हुआ उत्तम बाण हाथमें लिया॥ ४६ ॥

उस महान् बाणको इन्द्रजित्के द्वारा धनुषपर रखा गया देख भयानक पराक्रम करनेवाले महातेजस्वी लक्ष्मणने भी दूसरा बाण उठाया॥ ४७ ॥

उस बाणकी शिक्षा महात्मा कुबेरने स्वप्नमें प्रकट होकर स्वयं उन्हें दी थी। वह बाण इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी असह्य एवं दुर्जय था॥ ४८ ॥