भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2080

उन दोनोंकी परिघके समडन मोटी और बलिष्ठ भुजाओंद्वारा जोर-जोरसे खींचे जाते हुए उन दोनोंके श्रेष्ठ धनुष दो क्रौञ्च पक्षियोंके समान शब्द करने लगे॥ ४९ ॥

उन वीरोंने अपने-अपने श्रेष्ठ धनुषपर जो उत्तम सायक रखे थे, वे खींचे जाते ही अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठे॥ ५० ॥

दोनोंके बाण एक साथ ही धनुषसे छूटे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित करने लगे। दोनोंके मुखभाग बड़े वेगसे आपसमें टकरा गये॥ ५१ ॥

उन दोनों भयानक बाणोंकी ज्यों ही टक्कर हुई, उससे दारुण अग्नि प्रकट हो गयी; जिससे धूआँ उठने लगा और चिनगारियाँ दिखायी दीं॥ ५२ ॥

वे दोनों बाण दो महान् ग्रहोंकी भाँति आपसमें टकराकर सैकड़ों टुकड़े हो संग्रामभूमिमें गिर पड़े॥ ५३ ॥

युद्धके मुहानेपर उन दोनों बाणोंको आपसके आघात-प्रतिघातसे व्यर्थ हुआ देख लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंको ही उस समय लज्जा हुई। फिर दोनों एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त रोषसे भर गये॥ ५४ ॥

सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने कुपित होकर वारुणास्त्र उठाया। साथ ही उस रणभूमिमें खड़े हुए इन्द्रजित्ने रौद्रास्त्र उठाया और उसे वारुणास्त्रके प्रतीकारके लिये छोड़ दिया॥ ५५ ॥

उस रौद्रास्त्रसे आहत होकर लक्ष्मणका अत्यन्त अद्भुत वारुणास्त्र शान्त हो गया। तदनन्तर समरविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित्ने कुपित होकर दीप्तिमान् आग्नेयास्त्रका संधान किया, मानो वह उसके द्वारा समस्त लोकोंका प्रलय कर देना चाहता हो॥ ५६ ॥

परंतु वीर लक्ष्मणने सूर्यास्त्रके प्रयोगसे उसे शान्त कर दिया। अपने अस्त्रको प्रतिहत हुआ देख रावणकुमार इन्द्रजित् अचेत-सा हो गया॥ ५७ ॥

उसने आसुर नामक शत्रुनाशक तीखे बाणका प्रयोग किया, फिर तो उसके उस धनुषसे चमकते हुए कूट, मुद्गर, शूल, भुशुण्डि, गदा, खड्ग और फरसे निकलने लगे॥

रणभूमिमें उस भयंकर आसुरास्त्रको प्रकट हुआ देख तेजस्वी लक्ष्मणने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको विदीर्ण करनेवाले माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, जिसका समस्त प्राणी मिलकर भी निवारण नहीं कर सकते थे। उस माहेश्वरास्त्रके द्वारा उन्होंने उस आसुरास्त्रको नष्ट कर दिया॥ ५९-६० ॥