भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2081, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2081

इस प्रकार उन दोनोंमें अत्यन्त अद्भुत और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। आकाशमें रहनेवाले प्राणी लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये॥ ६१ ॥

भैरव-गर्जनासे गूँजते हुए वानरों और राक्षसोंके उस भयानक युद्धके छिड़ जानेपर आश्चर्यचकित हुए बहुसंख्यक प्राणी आकाशमें आकर खड़े हो गये। उनसे घिरे हुए उस आकाशकी अद्भुत शोभा हो रही थी॥

ऋषि, पितर, देवता, गन्धर्व, गरुड़ और नाग भी इन्द्रको आगे करके रणभूमिमें सुमित्राकुमारकी रक्षा करने लगे॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् लक्ष्मणने दूसरा उत्तम बाण अपने धनुषपर रखा, जिसका स्पर्श आगके समान जलानेवाला था। उसमें रावणकुमारको विदीर्ण कर देनेकी शक्ति थी॥ ६४ ॥

उसमें सुन्दर पर लगे थे। उस बाणका सारा अङ्ग सुडौल एवं गोल था। उसकी गाँठ भी सुन्दर थी। वह बहुत ही मजबूत और सुवर्णसे भूषित था। उसमें शरीरको चीर डालनेकी क्षमता थी। उसे रोकना अत्यन्त कठिन था। उसके आघातको सह लेना भी बहुत मुश्किल था। वह राक्षसोंको भयभीत करनेवाला तथा विषधर सर्पके विषकी भाँति शत्रुके प्राण लेनेवाला था। देवताओंद्वारा उस बाणकी सदा ही पूजा की गयी थी। पूर्वकालके देवासुर संग्राममें हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त रथवाले, पराक्रमी, शक्तिमान् एवं महातेजस्वी इन्द्रने उसी बाणसे दानवोंपर विजय पायी थी। उसका नाम था ऐन्द्रास्त्र। वह युद्धके अवसरोंपर कभी पराजित या असफल नहीं हुआ था। शोभासम्पन्न वीर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने अपने उत्तम धनुषपर उस श्रेष्ठ बाणको रखकर उसे खींचते हुए अपने अभिप्रायको सिद्ध करनेवाली यह बात कही— 'यदि दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा पुरुषार्थमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई वीर नहीं है तो हे अस्त्र! तुम इस रावणपुत्रका वध कर डालो'॥ ६५—६९ ॥

समराङ्गणमें ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वीर लक्ष्मणने सीधे जानेवाले उस बाणको कानतक खींचकर ऐन्द्रास्त्रसे संयुक्त करके इन्द्रजित्की ओर छोड़ दिया॥ ७० ॥

धनुषसे छूटते ही ऐन्द्रास्त्रने जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त इन्द्रजित्के शिरस्त्राणसहित दीप्तिमान् मस्तकको धड़से काटकर धरतीपर गिरा दिया॥ ७१ ॥

राक्षसपुत्र इन्द्रजित्का कंधेपरसे कटा हुआ वह विशाल सिर, जो खूनसे लथपथ हो रहा था, भूमिपर सुवर्णके समान दिखायी देने लगा॥ ७२ ॥