भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2089

रावणकी आँखें एक तो स्वभावसे ही लाल थीं। दूसरे क्रोधाग्निने उन्हें और भी रक्तवर्णकी बना दिया था। अतः उसके वे दीप्तिमान् नेत्र महान् घोर प्रतीत होते थे॥ २१ ॥

रावणका रूप स्वभावसे ही भयंकर था। उसपर क्रोधाग्निका प्रभाव पड़नेसे वह और भी भयानक हो चला और कुपित हुए रुद्रके समान दुर्जय प्रतीत होने लगा॥ २२ ॥

क्रोधसे भरे हुए उस निशाचरके नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं, मानो जलते हुए दीपकोंसे लौके साथ ही तेलके बिंदु झड़ रहे हों॥ २३ ॥

वह दाँत पीसने लगा। उस समय उसके दाँतोंके कटकटानेका जो शब्द सुनायी देता था, वह समुद्र-मन्थनके समय दानवोंद्वारा खींचे जाते हुए मन्थनयन्त्रस्वरूप मन्दराचलकी ध्वनिके समान जान पड़ता था॥

कालाग्निके समान अत्यन्त कुपित हो वह जिस-जिस दिशाकी ओर दृष्टि डालता था, उस-उस दिशामें खड़े हुए राक्षस भयभीत हो खम्भे आदिकी ओटमें छिप जाते थे॥ २५ ॥

चराचर प्राणियोंको ग्रस लेनेकी इच्छावाले कुपित कालके समान सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए रावणके पास राक्षस नहीं जाते थे—उसके निकट जानेका साहस नहीं करते थे॥ २६ ॥

तब अत्यन्त कुपित हुआ राक्षसराज रावण युद्धमें राक्षसोंको स्थापित करनेकी इच्छासे उनके बीचमें खड़ा होकर बोला— ॥ २७ ॥

‘निशाचरो! मैंने सहस्रों वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विभिन्न तपस्याओंकी समाप्तिपर स्वयम्भू ब्रह्माजीको संतुष्ट किया है॥ २८ ॥

‘उसी तपस्याके फलसे और ब्रह्माजीकी कृपासे मुझे देवताओं और असुरोंकी ओरसे कभी भय नहीं है॥

‘मेरे पास ब्रह्माजीका दिया हुआ कवच है, जो सूर्यके समान दमकता रहता है। देवताओं और असुरोंके साथ घटित हुए मेरे संग्रामके अवसरोंपर वह वज्रके प्रहारसे भी टूट नहीं सका है॥ ३० ॥

‘इसलिये यदि आज मैं युद्धके लिये तैयार हो रथपर बैठकर रणभूमिमें खड़ा होऊँ तो कौन मेरा सामना कर सकता है ? साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, वह भी मुझसे युद्ध करनेका साहस नहीं कर सकता॥ ३१ ॥