भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2090

‘उन दिनों देवासुर-संग्राममें प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने मुझे जो बाणसहित विशाल धनुष प्रदान किया था, आज मेरे उसी भयानक धनुषको सैकड़ों मङ्गल-वाद्योंकी ध्वनिके साथ महासमरमें राम और लक्ष्मणका वध करनेके लिये ही उठाया जाय॥ ३२-३३॥

पुत्रके वधसे संतप्त हो क्रोधके वशीभूत हुए क्रूर रावणने अपनी बुद्धिसे सोच-विचारकर सीताको मार डालनेका ही निश्चय किया॥ ३४॥

उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और आकृति अत्यन्त भयानक दिखायी देने लगी। वह सब ओर दृष्टि डालकर पुत्रके लिये दुःखी हो दीनतापूर्ण स्वरवाले सम्पूर्ण निशाचरोंसे बोला—॥ ३५॥

‘मेरे बेटेने मायासे केवल वानरोंको चकमा देनेके लिये एक आकृतिको ‘यह सीता है’ ऐसा कहकर दिखाया और झूठे ही उसका वध किया था॥ ३६॥

‘सो आज उस झूठको मैं सत्य ही कर दिखाऊँगा और ऐसा करके अपना प्रिय करूँगा। उस क्षत्रियाधम राममें अनुराग रखनेवाली सीताका नाश कर डालूँगा’॥

मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर उसने शीघ्र ही तलवार हाथमें ले ली, जो खड्गोचित गुणोंसे युक्त और आकाशके समान निर्मल कान्तिवाली थी। उसे म्यानसे निकालकर पत्नी और मन्त्रियोंसे घिरा हुआ रावण बड़े वेगसे आगे बढ़ा। पुत्रके शोकसे उसकी चेतना अत्यन्त आकुल हो रही थी॥ ३८-३९॥

वह अत्यन्त कुपित हो तलवार लेकर सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता मौजूद थीं। उधर जाते हुए उस राक्षसको देखकर उसके मन्त्री सिंहनाद करने लगे॥ ४०॥

वे रावणको रोषसे भरा देख एक-दूसरेका आलिङ्गन करके बोले—‘आज इसे देखकर वे दोनों भार्इ राम और लक्ष्मण व्यथित हो उठेंगे॥ ४१॥

‘क्योंकि कुपित होनेपर इस राक्षसराजने इन्द्र आदि चारों लोकपालोंको जीत लिया और दूसरे बहुत-से शत्रुओंको भी युद्धमें मार गिराया था॥ ४२॥

‘तीनों लोकोंमें जो रत्नभूत पदार्थ हैं, उन सबको लाकर रावण भोग रहा है। भूमण्डलमें इसके समान पराक्रमी और बलवान् दूसरा कोर्इ नहीं है’॥ ४३॥