भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2092

‘मेरी सास कौसल्या एक ही बेटेकी माँ हैं। यदि वे युद्धमें अपने पुत्रके विनाशका समाचार सुनेंगी तो मैं समझती हूँ कि उनका हृदय अवश्य फट जायगा॥ ५६ १/२ ॥

‘वे रोती हुई अपने महात्मा पुत्रके जन्म, बाल्यावस्था, युवावस्था, धर्म-कर्म तथा रूपका स्मरण करेंगी॥ ५७ १/२ ॥

‘अपने पुत्रके मारे जानेपर पुत्र-दर्शनसे निराश एवं अचेत-सी हो वे उनका श्राद्ध करके निश्चय ही जलती आगमें समा जायँगी अथवा सरयूकी जलधारामें आत्मविसर्जन कर देंगी॥ ५८ १/२ ॥

‘पापपूर्ण विचारवाली उस दुष्टा कुबड़ी मन्थराको धिक्कार है, जिसके कारण मेरी सास कौसल्याको यह पुत्रका शोक देखना पड़ेगा’॥ ५९ १/२ ॥

चन्द्रमासे बिछुड़कर किसी क्रूर ग्रहके वशमें पड़ी हुई रोहिणीकी भाँति तपस्विनी सीताको इस प्रकार विलाप करती देख रावणके सुशील एवं शुद्ध आचारविचार वाले सुपार्श्व नामक बुद्धिमान् मन्त्रीने दूसरे सचिवोंके मना करनेपर भी उस समय राक्षसराज रावणसे यह बात कही— ॥ ६०–६२ ॥

‘महाराज दशग्रीव! तुम तो साक्षात् कुबेरके भाई हो; फिर क्रोधके कारण धर्मको तिलाञ्जलि दे विदेहकुमारीके वधकी इच्छा कैसे कर रहे हो?॥ ६३ ॥

‘वीर राक्षसराज! तुम विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वेदविद्याका अध्ययन पूरा करके गुरुकुलसे स्नातक होकर निकले थे और तबसे सदा अपने कर्तव्यके पालनमें लगे रहे तो भी आज अपने हाथसे एक स्त्रीका वध करना तुम कैसे ठीक समझते हो?॥ ६४ ॥

‘पृथ्वीनाथ! इस मिथिलेशकुमारीके दिव्य रूपकी ओर देखो (देखकर इसके ऊपर दया करो) और युद्धमें हमलोगोंके साथ चलकर रामपर ही अपना क्रोध उतारो॥

‘आज कृष्णपक्षकी चतुर्दशी है। अतः आज ही युद्धकी तैयारी करके कल अमावास्याके दिन सेनाके साथ विजयके लिये प्रस्थान करो॥ ६६ ॥

‘तुम शूरवीर, बुद्धिमान् और रथी वीर हो। एक श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो खड्ग हाथमें लेकर युद्ध करो। दशरथनन्दन रामका वध करके तुम मिथिलेशकुमारी सीताको प्राप्त कर लोगे’॥ ६७ ॥