भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2103

‘मेरे बाण मेघोंकी घटाके समान सब ओर छा जायँगे; अतः अन्तरिक्ष, दिशाएँ, आकाश तथा समुद्र— कुछ भी दिखायी न देगा॥ १२ ॥

‘आज अपने धनुषसे पङ्खवाले बाणोंका जाल-सा बिछा दूँगा और वानरोंके मुख्य-मुख्य यूथोंका पृथक्-पृथक् वध करूँगा॥ १३ ॥

‘आज वायुके समान वेगशाली रथपर आरूढ़ हो मैं अपने धनुषरूपी समुद्रसे उठी हुई बाणमयी तरङ्गोंसे वानर-सेनाओंको मथ डालूँगा॥ १४ ॥

‘कमल-केसरकी-सी कान्तिवाले वानरोंके यूथ सरोवरोंके समान हैं। उनके मुख ही उन सरोवरोंके भीतर प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित होते हैं। आज मैं हाथीके समान उनमें प्रवेश करके उन वानर-यूथरूपी सरोवरोंको मथ डालूँगा॥ १५ ॥

‘आज युद्धस्थलमें गिरे हुए वानर-यूथपति अपने बाणविद्ध मुखोंद्वारा नालयुक्त कमलोंका भ्रम उत्पन्न करते हुए रणभूमिकी शोभा बढ़ायेंगे॥ १६ ॥

‘आज युद्धभूमिमें धनुषसे छूटे हुए एक-एक बाणसे मैं वृक्ष लेकर जूझनेवाले सौ-सौ प्रचण्ड वानरोंको विदीर्ण करूँगा॥ १७ ॥

‘आज शत्रुका वध करके मैं उन सब निशाचरोंके आँसू पोछूँगा, जिनके भाई और पुत्र इस युद्धमें मारे गये हैं॥ १८ ॥

आज युद्धमें मेरे बाणोंसे विदीर्ण तथा निर्जीव हुए वानर इस तरह बिछ जायँगे कि वहाँकी भूमि बड़े यत्नसे दीख सकेगी॥ १९ ॥

‘आज अपने बाणोंद्वारा मारे गये शत्रुओंके मांसोंसे मैं कौओं, गीधों तथा जो दूसरे मांसभक्षी जन्तु हैं, उन सबको भी तृप्त करूँगा॥ २० ॥

‘जल्दी मेरा रथ तैयार किया जाय, शीघ्र धनुष लाया जाय तथा मरनेसे बचे हुए निशाचर युद्धमें मेरे पीछे-पीछे चलें’॥ २१ ॥

रावणका वह वचन सुनकर महापार्श्वने वहाँ खड़े हुए सेनापतियोंसे कहा— ‘सेनाको शीघ्र ही कूच करनेकी आज्ञा दो’॥ २२ ॥

यह आज्ञा पाकर वे शीघ्रपराक्रमी सेनाध्यक्ष घरघर जाकर उन राक्षसोंको तैयार होनेका आदेश देते हुए सारी लङ्कामें घूमते फिरे॥ २३ ॥