श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सौ तीनवाँ सर्ग
श्रीरामका रावणको फटकारना और उनके द्वारा घायल किये गये रावणको सारथिका रणभूमिसे बाहर ले जाना
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा क्रोधपूर्वक अत्यन्त पीड़ित किये जानेपर युद्धकी इच्छा रखनेवाले रावणको महान् क्रोध हुआ॥ १ ॥
उसके नेत्र अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे। उस पराक्रमी वीरने अमर्षपूर्वक धनुष उठाया और अत्यन्त कुपित हो उस महासमरमें श्रीरघुनाथजीको पीड़ित करना आरम्भ किया॥ २ ॥
जैसे बादल आकाशसे जलकी धारा बरसाकर तालाबको भर देता है, उसी प्रकार रावणने सहस्रों बाणधाराओंकी वृष्टि करके श्रीरामचन्द्रजीको आच्छादित कर दिया॥ ३ ॥
युद्धस्थलमें रावणके धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंसे व्याप्त हो जानेपर भी श्रीरघुनाथजी विचलित नहीं हुए; क्योंकि वे महान् पर्वतकी भाँति अचल थे॥ ४ ॥
वे समराङ्गणमें अपने बाणोंसे रावणके बाणोंका निवारण करते हुए स्थिरभावसे खड़े रहे। उन पराक्रमी रघुवीरने सूर्यके किरणोंकी भाँति शत्रुके बाणोंको ग्रहण किया॥ ५ ॥
तदनन्तर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले निशाचर रावणने कुपित हो महामना राघवेन्द्रकी छातीमें सहस्रों बाण मारे॥ ६ ॥
समरभूमिमें उन बाणोंसे घायल हुए लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम रक्तसे नहा उठे और जंगलमें खिले हुए पलाशके महान् वृक्षकी भाँति दिखायी देने लगे॥ ७ ॥
उन बाणोंके आघातसे कुपित हो महातेजस्वी श्रीरामने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी सायकोंको हाथमें लिया॥ ८ ॥
फिर तो वे दोनों परस्पर रोषावेशसे युक्त हो बाण चलाने लगे। समराङ्गणमें बाणोंसे अन्धकार-सा छा गया। उस समय श्रीराम और रावण दोनों एक-दूसरेको देख नहीं पाते थे॥ ९ ॥
इसी समय क्रोधसे भरे हुए वीर दशरथकुमार श्रीरामने रावणसे हँसते हुए कठोर वाणीमें कहा— ॥ १० ॥
‘नीच राक्षस! तू मेरे अनजानमें जनस्थानसे मेरी असहाय स्त्रीको हर लाया है, इसलिये तू बलवान् या पराक्रमी तो कदापि नहीं है॥ ११ ॥