भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2141

‘विशाल वनमें मुझसे विलग हुई दीन अवस्थामें विद्यमान विदेहराजकुमारीका बलपूर्वक अपहरण करके तू अपनेको शूरवीर समझता है?॥ १२ ॥

‘असहाय अबलाओंपर वीरता दिखानेवाले निशाचर! परस्त्रीके अपहरण-जैसे कापुरुषोचित कर्म करके तू अपनेको शूरवीर मानता है?॥ १३ ॥

‘धर्मकी मर्यादा भङ्ग करनेवाले पापी, निर्लज्ज और सदाचारशून्य निशाचर! तूने बलके घमंडसे वैदेहीके रूपमें अपनी मौत बुलायी है। क्या अब भी तू अपनेको शूरवीर समझता है?॥ १४ ॥

‘तू बड़ा शूरवीर, बलसम्पन्न और साक्षात् कुबेरका भाई जो है! इसीलिये तूने यह परम प्रशंसनीय और महान् यशोवर्धक कर्म किया है॥ १५ ॥

‘अभिमानपूर्वक किये गये उन निन्दित और अहितकर पाप-कर्मका जो महान् फल है, उसे तू आज अभी प्राप्त कर ले॥ १६ ॥

‘खोटी बुद्धिवाले निशाचर! तू अपनेको शूरतासे सम्पन्न समझता है; किंतु सीताको चोरकी तरह चुराते समय तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आयी?॥ १७ ॥

‘यदि मेरे समीप तू सीताका बलपूर्वक अपहरण करता तो अबतक मेरे सायकोंसे मारा जाकर अपने भाई खरका दर्शन करता होता॥ १८ ॥

‘मन्दबुद्धे! सौभाग्यकी बात है कि आज तू मेरी आँखोंके सामने आ गया है। मैं अभी तुझे अपने तीखे बाणोंसे यमलोक पहुँचाता हूँ॥ १९ ॥

‘आज मेरे बाणोंसे कटकर रणभूमिकी धूलमें पड़े हुए जगमगाते कुण्डलोंसे युक्त तेरे मस्तकको मांसभक्षी जीव-जन्तु घसीटें॥ २० ॥

‘रावण! तेरी लाश पृथ्वीपर फेंकी पड़ी हो, उसकी छातीपर बहुत-से गृध्र टूट पड़ें और बाणोंकी नोकसे किये गये छेदके द्वारा प्रवाहित होनेवाले तेरे खूनको बड़ी प्यासके साथ पियें॥ २१ ॥

‘आज मेरे बाणोंसे विदीर्ण और प्राणशून्य होकर पड़े हुए तेरे शरीरकी आँतोंको पक्षी उसी तरह खींचें, जैसे गरुड़ सर्पोंको खींचते हैं’॥ २२ ॥

ऐसा कहते हुए शत्रुओंका नाश करनेवाले वीर श्रीरामने पास ही खड़े हुए राक्षसराज रावणपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ २३ ॥