श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘अब मैं बन्धुजनोंसे हीन, आप-जैसे स्वामीसे रहित तथा कामभोगोंसे वञ्चित होकर अनन्त वर्षोंतक शोकमें ही डूबी रहूँगी॥ ५८ १/२ ॥
‘राजन्! आज आप जिस अत्यन्त दुर्गम एवं विशाल मार्गपर गये हैं, वहीं मुझ दुखियाको भी ले चलिये। मैं आपके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी॥
‘हाय! मुझ असहायाको यहीं छोड़कर आप क्यों अन्यत्र चले जाना चाहते हैं? मैं दीन अभागिनी होकर आपके लिये रो रही हूँ। आप मुझसे बोलते क्यों नहीं?॥ ६० १/२ ॥
‘प्रभो! आज मेरे मुँहपर घूँघट नहीं है। मैं नगरद्वार से पैदल ही चलकर यहाँ आयी हूँ। इस दशामें मुझे देखकर आप क्रोध क्यों नहीं करते हैं?॥ ६१ १/२ ॥
‘आप अपनी स्त्रियोंसे बड़ा प्रेम करते थे। आज आपकी सभी स्त्रियाँ लाज छोड़कर, परदा हटाकर बाहर निकल आयी हैं। इन्हें देखकर आपको क्रोध क्यों नहीं होता?॥ ६२ १/२ ॥
‘नाथ! आपकी क्रीडासहचरी यह मन्दोदरी आज अनाथ होकर विलाप कर रही है। आप इसे आश्वासन क्यों नहीं देते अथवा अधिक आदर क्यों नहीं करते?॥
‘राजन्! आपने बहुत-सी कुलललनाओंको, जो गुरुजनोंकी सेवामें लगी रहनेवाली, धर्मपरायणा तथा पतिव्रता थीं, विधवा बनाया और उनका अपमान किया था; अतः उस समय उन्होंने शोकसे संतप्त होकर आपको शाप दे दिया था, उसीका यह फल है कि आपको शत्रु एवं मृत्युके अधीन होना पड़ा है॥ ६४-६५ १/२ ॥
‘महाराज! पतिव्रताओंके आँसू इस पृथ्वीपर व्यर्थ नहीं गिरते, यह कहावत आपके ऊपर प्रायः ठीक-ठीक घटी है॥ ६६ १/२ ॥
‘राजन्! आप तो अपने तेजसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके अपनेको बड़ा शूरवीर मानते थे; फिर भी परायी स्त्रीको चुरानेका यह नीच काम आपने कैसे किया?॥ ६७ १/२ ॥
‘मायामय मृगके बहाने श्रीरामको आश्रमसे दूर हटाया और लक्ष्मणको भी अलग किया। उसके बाद आप श्रीरामपत्नी सीताको चुराकर यहाँ ले आये; यह कितनी बड़ी कायरता है॥ ६८ १/२ ॥
‘युद्धमें कभी आपने कायरता दिखायी हो, यह मुझे याद नहीं पड़ता; परंतु भाग्यके फेरसे उस दिन सीताका हरण करते समय निश्चय ही आपमें कायरता आ गयी थी, जो आपके निकट