श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2175, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनाशकी सूचना दे रही थी॥ ६९ १/२ ॥
‘महाबाहो! मेरे देवर विभीषण सत्यवादी, भूत और भविष्यके ज्ञाता तथा वर्तमानको भी समझनेमें कुशल हैं। उन्होंने हरकर लायी हुई मिथिलेशकुमारी सीताको देखकर मन-ही-मन कुछ विचार किया और अन्तमें लम्बी साँस छोड़कर कहा—अब प्रधान-प्रधान राक्षसोंके विनाशका समय उपस्थित हो गया है। उनकी यह बात ठीक निकली॥ ७०-७१ १/२ ॥
‘काम और क्रोधसे उत्पन्न आपके आसक्तिविषयक दोषके कारण यह सारा ऐश्वर्य नष्ट हो गया और जड़मूलका नाश करनेवाला यह महान् अनर्थ प्राप्त हुआ। आज आपने समस्त राक्षसकुलको अनाथ कर दिया॥
‘आप अपने बल और पुरुषार्थके लिये विख्यात थे, अतः आपके लिये शोक करना मेरे लिये उचित नहीं है, तथापि स्त्रीस्वभावके कारण मेरे हृदयमें दीनता आ गयी है॥ ७४ ॥
‘आप अपना पुण्य और पाप साथ लेकर अपनी वीरोचित गतिको प्राप्त हुए हैं। आपके विनाशसे मैं महान् दुःखमें पड़ गयी हूँ; इसलिये बारम्बार अपने ही लिये शोक करती हूँ॥ ७५ ॥
‘महाराज दशानन! हित चाहनेवाले सुहृदों तथा बन्धुओंने जो आपसे सम्पूर्णतः हितकी बातें कही थीं, उन्हें आपने अनसुनी कर दिया॥ ७६ ॥
‘विभीषणका कथन भी युक्ति और प्रयोजनसे पूर्ण था। विधिपूर्वक आपके सामने प्रस्तुत किया गया था। वह कल्याणकारी तो था ही, बहुत ही सौम्य भाषामें कहा गया था; किंतु उस युक्तियुक्त बातको भी आपने नहीं माना॥ ७७ ॥
‘आप अपने बलके घमंडमें मतवाले हो रहे थे; अतः मारीच, कुम्भकर्ण तथा मेरे पिताकी कही हुई बात भी आपने नहीं मानी। उसीका यह ऐसा फल आपको प्राप्त हुआ है॥ ७८ ॥
‘प्राणनाथ! आपका नील मेघके समान श्याम वर्ण है। आप शरीरपर पीत वस्त्र और बाँहोंमें सुन्दर बाजूबंद धारण करनेवाले हैं। आज खूनसे लथपथ हो अपने शरीरको सब ओर छितराकर यहाँ क्यों सो रहे हैं?॥
‘मैं शोकसे पीड़ित हो रही हूँ और आप गहरी नींदमें सोये हुए पुरुषकी भाँति मेरी बातका जवाब नहीं दे रहे हैं। नाथ! ऐसा क्यों हो रहा है?॥ ७९ १/२ ॥
‘मैं महान् पराक्रमी, युद्धकुशल और समरभूमिसे पीछे न हटनेवाले सुमाली नामक राक्षसकी दौहित्री (नतिनी) हूँ। आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं॥ ८० १/२ ॥