श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘राक्षसराज! उठिये, उठिये। श्रीरामके द्वारा आपका नूतन पराभव किया गया है तो भी आप सो कैसे रहे हैं? आज ही ये सूर्यकी किरणें लङ्कामें निर्भय होकर प्रविष्ट हुई हैं॥ ८१ १/२ ॥
‘वीरवर! आप समरभूमिमें जिस सूर्यतुल्य तेजस्वी परिघके द्वारा शत्रुओंका संहार किया करते थे, वज्रधारी इन्द्रके वज्रकी भाँति जो सदा आपके द्वारा पूजित हुआ था, रणभूमिमें बहुसंख्यक शत्रुओंके प्राण लेनेवाला था और जिसे सोनेकी जालीसे विभूषित किया गया था, आपका वह परिघ श्रीरामके बाणोंसे सहस्रों टुकड़ोंमें विभक्त होकर इधर-उधर बिखरा पड़ा है॥ ८२-८३ १/२ ॥
‘प्राणनाथ! आप अपनी प्यारी पत्नीकी भाँति रणभूमिका आलिङ्गन करके क्यों सो रहे हैं और किस कारणसे मुझे अप्रिय-सी मानकर मुझसे बोलनातक नहीं चाहते हैं?॥ ८४ १/२ ॥
‘आपकी मृत्यु हो जानेपर भी मेरे शोकपीड़ित हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो जाते; अतः मुझ पाषाणहृदया नारीको धिक्कार है’॥ ८५ १/२ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई मन्दोदरीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। उसका हृदय स्नेहसे द्रवीभूत हो रहा था। वह रोती-रोती सहसा मूर्च्छित हो गयी और उसी अवस्थामें रावणकी छातीपर गिर पड़ी। रावणके वक्षःस्थलपर मन्दोदरीकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे संध्याकी लालीसे रँगे हुए बादलमें दीप्तिमती विद्युत् चमक रही हो॥ ८६-८७ १/२ ॥
उसकी सौतें भी शोकसे अत्यन्त आतुर हो रही थीं, उन्होंने उसे उस अवस्थामें देखकर उठाया और स्वयं भी रोते-रोते जोर-जोरसे विलाप करती हुई मन्दोदरीको धीरज बँधाया॥ ८८ १/२ ॥
वे बोलीं—‘महारानी! क्या आप नहीं जानतीं कि संसारका स्वरूप अस्थिर है। दशा बदल जानेपर राजाओंकी लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती’॥ ८९ १/२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर मन्दोदरी फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय उसके दोनों स्तन और उज्ज्वल मुख आँसुओंसे नहा उठे थे॥ ९० १/२ ॥
इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे कहा— ‘इन स्त्रियोंको धैर्य बँधाओ और अपने भाईका दाहसंस्कार करो’॥ ९१ १/२ ॥
यह सुनकर बुद्धिमान् विभीषणने (श्रीरामका अभिप्राय जाननेके उद्देश्यसे) बुद्धिसे सोच-विचारकर उनसे यह धर्म और अर्थसे युक्त विनयपूर्ण तथा हितकर बात कही—॥ ९२ १/२ ॥