भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2177, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2177

‘भगवन्! जिसने धर्म और सदाचारका त्याग कर दिया था, जो क्रूर, निर्दयी, असत्यवादी तथा परायी स्त्रीका स्पर्श करनेवाला था, उसका दाहसंस्कार करना मैं उचित नहीं समझता हूँ॥ ९३ १/२ ॥

‘सबके अहितमें संलग्न रहनेवाला यह रावण भाईके रूपमें मेरा शत्रु था। यद्यपि ज्येष्ठ होनेसे गुरुजनोचित गौरवके कारण वह मेरा पूज्य था, तथापि वह मुझसे सत्कार पानेयोग्य नहीं है॥ ९४ १/२ ॥

‘श्रीराम! मेरी यह बात सुनकर संसारके मनुष्य मुझे क्रूर अवश्य कहेंगे; परंतु जब रावणके दुर्गुणोंको भी सुनेंगे, तब सब लोग मेरे इस विचारको उचित ही बतायेंगे’॥ ९५ १/२ ॥

यह सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। वे बातचीत करनेमें बड़े प्रवीण थे; अतः बातोंका अभिप्राय समझनेवाले विभीषणसे इस प्रकार बोले— ॥ ९६ १/२ ॥

‘राक्षसराज! मुझे तुम्हारा भी प्रिय करना है, क्योंकि तुम्हारे ही प्रभावसे मेरी जीत हुई है। अवश्य ही मुझे तुमसे उचित बात कहनी चाहिये; अतः सुनो॥

‘यह निशाचर भले ही अधर्मी और असत्यवादी रहा हो; परंतु संग्राममें सदा ही तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है॥ ९८ १/२ ॥

‘सुना जाता है—इन्द्र आदि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे। समस्त लोकोंको रुलानेवाला रावण बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा महामनस्वी था॥ ९९ १/२ ॥

‘वैर मरनेतक ही रहता है। मरनेके बाद उसका अन्त हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन भी सिद्ध हो चुका है, अतः इस समय जैसे यह तुम्हारा भाई है, वैसे ही मेरा भी है; इसलिये इसका दाहसंस्कार करो॥ १०० १/२ ॥

‘महाबाहो! धर्मके अनुसार रावण तुम्हारी ओरसे शीघ्र ही विधिपूर्वक दाहसंस्कार प्राप्त करनेके योग्य है। ऐसा करनेसे तुम यशके भागी होओगे’॥ १०१ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनको सुनकर विभीषण युद्धमें मारे गये अपने भाई रावणके दाहसंस्कारकी शीघ्रतापूर्वक तैयारी करने लगे॥ १०२ १/२ ॥

राक्षसराज विभीषणने लङ्कापुरीमें प्रवेश करके रावणके अग्निहोत्रको शीघ्र ही विधिपूर्वक समाप्त किया॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण · पृष्ठ 2177, कुल 2621 में से · BharatKosha