श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसके बाद शकट, लकड़ी, अग्निहोत्रकी अग्नियां, यज्ञ करानेवाले पुरोहित, चन्दनकाष्ठ, अन्य विविध प्रकारकी लकड़ियां, सुगन्धित अगर, अन्यान्य सुन्दर गन्धयुक्त पदार्थ, मणि, मोती और मूँगा—इन सब वस्तुओंको उन्होंने एकत्र किया॥ १०४-१०५ १/२ ॥
फिर दो ही घड़ीमें राक्षसोंसे घिरे हुए वे शीघ्र वहाँसे चले आये। तदनन्तर माल्यवान्के साथ मिलकर उन्होंने दाहसंस्कारकी तैयारीका सारा कार्य पूर्ण किया॥
भाँति-भाँतिके वाद्यघोषोंद्वारा स्तुति करनेवाले मागधोंने जिसका अभिनन्दन किया था, राक्षसराज रावणके उस शवको रेशमी वस्त्रसे ढककर उसे सोनेके दिव्य विमानमें रखनेके पश्चात् राक्षसजातीय ब्राह्मण वहाँ नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए खड़े हो गये॥ १०७-१०८ ॥
उस शिबिकाको विचित्र पताकाओं तथा फूलोंसे सजाया गया था। जिससे वह विचित्र शोभा धारण करती थी। विभीषण आदि राक्षस उसे कंधेपर उठाकर तथा अन्य सब लोग हाथमें सूखे काठ लिये दक्षिण दिशामें श्मशानभूमिकी ओर चले॥ १०९ १/२ ॥
यजुर्वेदीय याजकोंद्वारा ढोयी जाती हुई त्रिविध अग्नियां प्रज्वलित हो उठीं। वे सब कुण्डमें रखी हुई थीं और पुरोहितगण उन्हें लेकर शवके आगे-आगे चल रहे थे॥
अन्तःपुरकी सारी स्त्रियाँ रोती हुई तुरंत ही शवके पीछे-पीछे चल पड़ीं। वे सब ओर लड़खड़ाती चलती थीं॥ १११ १/२ ॥
आगे जाकर रावणके विमानको एक पवित्र स्थानमें रखकर अत्यन्त दुःखी हुए विभीषण आदि राक्षसोंने मलय-चन्दनकाष्ठ, पद्मक, उशीर (खस) तथा अन्य प्रकारके चन्दनोंद्वारा वेदोक्त विधिसे चिता बनायी और उसके ऊपर रंकु नामक मृगका चर्म बिछाया॥
उसके ऊपर राक्षसराजके शवको सुलाकर उन्होंने उत्तम विधिसे उसका पितृमेध (दाहसंस्कार) किया। उन्होंने चिताके दक्षिण-पूर्वमें वेदी बनाकर उसपर यथास्थान अग्निको स्थापित किया था। फिर दधिमिश्रित घीसे भरी हुई स्रुवा रावणके कंधेपर रखी। इसके बाद पैरोंपर शकट और जाँघोंपर उलूखल रखा॥ ११४-११५ ॥
तथा काष्ठके सभी पात्र, अरणि, उत्तरारणि और मूसल आदिको भी यथास्थान रख दिया॥ ११६ ॥
वेदोक्त विधि और महर्षियोंद्वारा रचित कल्पसूत्रोंमें बतायी गयी प्रणालीसे वहाँ सारा कार्य हुआ। राक्षसोंने (राक्षसोंकी रीति के अनुसार) मेध्य पशुका हनन करके राजा रावणकी