भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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एक सौ तेरहवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीका सीताजीसे बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीरामको सुनाना

भगवान् श्रीरामका यह आदेश पाकर पवनपुत्र हनुमान्‌जीने निशाचरोंसे सम्मानित होते हुए लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ १ ॥

पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने विभीषणसे आज्ञा माँगी। उनकी आज्ञा मिल जानेपर हनुमान्‌जी अशोकवाटिकामें गये॥ २ ॥

अशोकवाटिकामें प्रवेश करके न्यायानुसार उन्होंने सीताजीको अपने आगमनकी सूचना दी। तत्पश्चात् निकट जाकर उनका दर्शन किया। वे स्नान आदिसे हीन होनेके कारण कुछ मलिन दिखायी देती थीं और सशङ्क हुईं रोहिणीके समान जान पड़ती थीं॥ ३ ॥

सीताजी आनन्दशून्य हो वृक्षके नीचे राक्षसियोंसे घिरी बैठी थीं। हनुमान्‌जीने शान्त और विनीतभावसे सामने जाकर उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम करके वे चुपचाप खड़े हो गये॥ ४ ॥

महाबली हनुमान्‌को आया देख देवी सीता उन्हें पहचानकर मन-ही-मन प्रसन्न हुईं; किंतु कुछ बोल न सकीं। चुपचाप बैठी रहीं॥ ५ ॥

सीताके मुखपर सौम्यभाव लक्षित हो रहा था। उसे देखकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌ने श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुईं सब बातोंको उनसे कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥

‘विदेहनन्दिनि! श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ सकुशल हैं। अपने शत्रु का वध करके सफलमनोरथ हुए उन शत्रुविजयी श्रीरामने आपकी कुशल पूछी है॥

‘देवि! विभीषणकी सहायता पाकर वानरों और लक्ष्मणसहित श्रीरामने बल-विक्रमसम्पन्न रावणको युद्धमें मार डाला है॥ ८ ॥

‘धर्मको जाननेवाली देवि सीते! मैं आपको यह प्रिय संवाद सुनाता हूँ और अधिक-से-अधिक प्रसन्न देखना चाहता हूँ। आपके पातिव्रत्य-धर्मके प्रभावसे ही युद्धमें श्रीरामने यह महान् विजय प्राप्त की है। अब आप चिन्ता छोड़कर स्वस्थ हो जायँ। हमलोगोंका शत्रु रावण मारा गया और लङ्का भगवान् श्रीरामके अधीन हो गयी॥ ९-१० ॥

‘श्रीरामने आपको यह संदेश दिया है—‘देवि! मैंने तुम्हारे उद्धारके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसके लिये निद्रा त्यागकर अथक प्रयत्न किया और समुद्रमें पुल बाँधकर रावणवधके द्वारा