भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2184

उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किया॥ ११ ॥

‘अब तुम अपनेको रावणके घरमें वर्तमान समझकर भयभीत न होना; क्योंकि लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणके अधीन कर दिया गया है। अब तुम अपने ही घरमें हो। ऐसा जानकर निश्चिन्त होकर धैर्य धारण करो। देवि! ये विभीषण भी हर्षसे भरकर आपके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो अभी यहाँ आ रहे हैं’॥ १२-१३ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर चन्द्रमुखी सीतादेवीको बड़ा हर्ष हुआ। हर्षसे उनका गला भर आया और वे कुछ बोल न सकीं॥ १४ ॥

सीताजीको मौन देख कपिवर हनुमान्जी बोले— ‘देवि! आप क्या सोच रही हैं? मुझसे बोलती क्यों नहीं’॥ १५ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मपरायणा सीतादेवी अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दके आँसू बहाती हुईं गद्गद वाणीमें बोलीं— ॥ १६ ॥

‘अपने स्वामीकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला यह प्रिय संवाद सुनकर मैं आनन्दविभोर हो गयी थी; इसलिये कुछ देरतक मेरे मुँहसे बात नहीं निकल सकी है॥ १७ ॥

‘वानरवीर! ऐसा प्रिय समाचार सुनानेके कारण मैं तुम्हें कुछ पुरस्कार देना चाहती हूँ; किंतु बहुत सोचनेपर भी मुझे इसके योग्य कोई वस्तु दिखायी नहीं देती॥ १८ ॥

‘सौम्य वानरवीर! इस भूमण्डलमें मैं कोई ऐसी वस्तु नहीं देखती, जो इस प्रिय संवादके अनुरूप हो और जिसे तुम्हें देकर मैं संतुष्ट हो सकूँ॥ १९ ॥

‘सोना, चाँदी, नाना प्रकारके रत्न अथवा तीनों लोकोंका राज्य भी इस प्रिय समाचारकी बराबरी नहीं कर सकता’॥ २० ॥

विदेहनन्दिनीके ऐसा कहनेपर वानरवीर हनुमान्जीको बड़ा हर्ष हुआ। वे सीताजीके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये और इस प्रकार बोले— ॥ २१ ॥

‘पतिकी विजय चाहनेवाली और पतिके ही प्रिय एवं हितमें सदा संलग्न रहनेवाली सती-साध्वी देवि! आपके ही मुँहसे ऐसा स्नेहपूर्ण वचन निकल सकता है (आपके इस वचनसे मैं सब कुछ पा गया)॥ २२ ॥

‘सौम्ये! आपका यह वचन सारगर्भित और स्नेहयुक्त है, अतः भाँति-भाँतिकी रत्नराशि और देवताओंके राज्यसे भी बढ़कर है॥ २३ ॥