श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहनुमान्जीके ऐसा कहनेपर करुणामय स्वभाववाली दीनवत्सला सीताने मन-ही-मन बहुत कुछ सोचविचार करके उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ १/२ ॥
‘कपिश्रेष्ठ! ये बेचारी राजाके आश्रयमें रहनेके कारण पराधीन थीं। दूसरोंकी आज्ञासे ही सब कुछ करती थीं, अतः स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाली इन दासियोंपर कौन क्रोध करेगा? मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं था तथा मेरे पूर्वजन्मके दुष्कर्म अपना फल देने लगे थे, इसीसे मुझे यह सब कष्ट प्राप्त हुआ है; क्योंकि सभी प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका ही फल भोगते हैं, अतः महाबाहो! तुम इन्हें मारनेकी बात न कहो। मेरे लिये दैवका ही ऐसा विधान था॥ ३८—४० ॥
‘मुझे अपने पूर्वकर्मजनित दशाके योगसे यह सारा दुःख निश्चितरूपसे भोगना ही था; इसलिये रावणकी दासियोंका यदि कुछ अपराध हो भी तो उसे मैं क्षमा करती हूँ; क्योंकि इनके प्रति दयाके उद्रेकसे मैं दुर्बल हो रही हूँ॥ ४१ ॥
‘पवनकुमार! उस राक्षसकी आज्ञासे ही ये मुझे धमकाया करती थीं। जबसे वह मारा गया है, तबसे ये बेचारी मुझे कुछ नहीं कहती हैं। इन्होंने डराना-धमकाना छोड़ दिया है॥ ४२ ॥
‘वानरवीर! इस विषयमें एक पुराना धर्मसम्मत श्लोक है, जिसे किसी व्याघ्रके निकट एक रीछने कहा था*। वह श्लोक मैं बता रही हूँ' सुनो॥ ४३ ॥
‘श्रेष्ठ पुरुष दूसरेकी बुराऽइ करनेवाले पापियोंके पापकर्मको नहीं अपनाते हैं—बदलेमें उनके साथ स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहते हैं, अतः अपनी प्रतिज्ञा एवं सदाचारकी रक्षा ही करनी चाहिये; क्योंकि साधुपुरुष अपने उत्तम चरित्रसे ही विभूषित होते हैं। सदाचार ही उनका आभूषण है' ॥ ४४ ॥
‘श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि कोऽइ पापी हों या पुण्यात्मा अथवा वे वधके योग्य अपराध करनेवाले ही क्यों न हों, उन सबपर दया करें; क्योंकि ऐसा कोऽइ भी प्राणी नहीं है, जिससे कभी अपराध होता ही न हो॥ ४५ ॥
‘जो लोगोंकी हिंसामें ही रमते और सदा पापका ही आचरण करते हैं, उन क्रूर स्वभाववाले पापियोंका भी कभी अमङ्गल नहीं करना चाहिये’॥ ४६ ॥
सीताजीके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल हनुमान्जीने उन सती-साध्वी श्रीरामपत्नीको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ४७ ॥