श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘देवि! आप श्रीरामकी धर्मपत्नी हैं; अतः आपका ऐसे सद्गुणोंसे सम्पन्न होना उचित ही है। अब आप अपनी ओरसे मुझे कोर्इ संदेश दें। मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाऊँगा’॥ ४८ ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी जनकराजकिशोरी बोलीं—‘मैं अपने भक्तवत्सल स्वामीका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ४९ ॥
सीताजीकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्जी उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार बोले—॥ ५० ॥
‘देवि! जैसे शची देवराज इन्द्रका दर्शन करती हैं, उसी प्रकार आप पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उन श्रीराम और लक्ष्मणको आज देखेंगी, जिनके मित्र विद्यमान हैं और शत्रु मारे जा चुके हैं’॥ ५१ ॥
साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होनेवाली सीतादेवीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी हनुमान्जी उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे॥ ५२ ॥
वहाँसे लौटते ही कपिवर हनुमान्जीने देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीसे जनकराजकिशोरी सीताजीका दिया हुआ उत्तर क्रमशः कह सुनाया॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११३ ॥
* शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥
सुननेकी इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, ऊहा (तर्क-वितर्क), अपोह (सिद्धान्तका निश्चय), अर्थका ज्ञान होना तथा तत्त्वको समझना—ये आठ बुद्धिके गुण हैं।
*पहलेकी बात है—एक बाघने किसी व्याधका पीछा किया। व्याध भागकर एक वृक्षपर चढ़ गया। उस वृक्षपर पहलेसे ही कोर्इ रीछ बैठा हुआ था। बाघ वृक्षकी जड़के पास पहुँचकर पेड़पर बैठे हुए रीछसे बोला—‘हम और तुम दोनों ही वनके जीव हैं। यह व्याध हम दोनोंका ही शत्रु है; अतः तुम इसे वृक्षसे नीचे गिरा दो।’ रीछने उत्तर दिया—‘यह व्याध मेरे निवासस्थानपर आकर एक प्रकारसे मेरी शरण ले चुका है, इसलिये मैं इसे नीचे नहीं गिराऊँगा। यदि गिरा दूँ तो धर्मकी हानि होगी।’ ऐसा कहकर रीछ सो गया। तब बाघने व्याधसे कहा—‘देखो, इस सोये हुए रीछको नीचे गिरा दो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।’ उसके ऐसा कहनेपर व्याधने उस रीछको धक्का दे दिया; परंतु रीछ अभ्यासवश दूसरी डाल पकड़कर गिरनेसे बच गया। तब बाघने रीछसे कहा—‘यह व्याध तुमको गिराना चाहता था; अतः अपराधी है। इसलिये अब इसको नीचे ढकेल दो।’ बाघके इस प्रकार बारम्बार उकसानेपर भी रीछने उस व्याधको नहीं गिराया और ‘न परः पापमादत्ते’ इस श्लोकका गान करके उसे मुँहतोड़ उत्तर दे दिया। यह प्राचीन कथा है। (रामायणभूषण-टीकासे)