श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2235, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंधृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मन्त्रपाल और सुमन्त्र—ये आठों मन्त्री ध्वजा और आभूषणोंसे विभूषित मतवाले हाथियोंपर चढ़कर चले॥ ११ १/२ ॥
दूसरे बहुत-से महारथी वीर सुनहरे रस्सोंसे कसी हुई हथिनियों, हाथियों, घोड़ों और रथोंपर सवार होकर निकले॥ १२ १/२ ॥
ध्वजा-पताकाओंसे विभूषित हजारों अच्छे-अच्छे घोड़ों और घुड़सवारों तथा हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि और पाश धारण करनेवाले सहस्रों पैदल योद्धाओंसे घिरे हुए वीर पुरुष श्रीरामकी अगवानीके लिये गये॥ १३-१४ ॥
तदनन्तर राजा दशरथकी सभी रानियाँ सवारियोंपर चढ़कर कौसल्या और सुमित्राको आगे करके निकलीं तथा कैकेयीसहित सब-की-सब नन्दिग्राममें आ पहुँचीं॥ १५-१६ ॥
धर्मात्मा एवं धर्मज्ञ भरत मुख्य-मुख्य ब्राह्मणों, व्यवसायी वर्गके प्रधानों, वैश्यों तथा हाथोंमें माला और मिठाई लिये मन्त्रियोंसे घिरकर अपने बड़े भाईकी चरणपादुकाओंको सिरपर धारण किये शङ्खों और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनिके साथ चले। उस समय बन्दीजन उनका अभिनन्दन कर रहे थे॥ १७-१८ ॥
श्वेत मालाओंसे सुशोभित सफेद रंगका छत्र तथा राजाओंके योग्य सोनेसे मढ़े हुए दो श्वेत चँवर भी उन्होंने अपने साथ ले रखे थे॥ १९ ॥
भरतजी उपवासके कारण दीन और दुर्बल हो रहे थे। वे चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्म धारण किये थे। भाईका आगमन सुनकर पहले-पहल उन्हें महान् हर्ष हुआ था॥ २० ॥
महात्मा भरत उस समय श्रीरामकी अगवानीके लिये आगे बढ़े। घोड़ोंकी टापों, रथके पहियोंकी नेमियों और शङ्खों एवं दुन्दुभियोंके गम्भीर नादोंसे सारी पृथ्वी हिलती-सी जान पड़ती थी। शङ्खों और दुन्दुभियोंकी ध्वनियोंसे मिले हुए हाथियोंके गर्जन-शब्द भी भूतलको कम्पित-सा किये देते थे॥ २१-२२ ॥
भरतजीने जब देखा कि अयोध्यापुरीके सभी नागरिक नन्दिग्राममें आ गये हैं, तब उन्होंने पवनपुत्र हनुमान्जीसे कहा— ॥ २३ ॥
‘वानर-वीर! वानरोंका चित्त स्वभावतः चञ्चल होता है। कहीं आपने भी उसी गुणका सेवन तो नहीं किया है—श्रीरामके आनेकी झूठी ही खबर तो नहीं उड़ा दी है; क्योंकि मुझे अभीतक