भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2236

शत्रुओंको संताप देनेवाले ककुत्स्थकुलभूषण आर्य श्रीरामके दर्शन नहीं हो रहे हैं तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं?' ॥ २४ १/२ ॥

भरतजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीने सार्थक एवं सत्य बात बतानेके लिये उन सत्यपराक्रमी भरतजीसे कहा— ॥ २५ १/२ ॥

'मुनिवर भरद्वाजजीकी कृपासे रास्तेके सभी वृक्ष सदा फूलने-फलनेवाले हो गये हैं और उनसे मधुकी धाराएँ गिरती हैं। उन वृक्षोंपर मतवाले भ्रमर निरन्तर गूँजते रहते हैं। उन्हें पाकर वानरलोग अपनी भूख-प्यास मिटाने लगे हैं॥ २६ १/२ ॥

'परंतप! देवराज इन्द्रने भी श्रीरामचन्द्रजीको ऐसा ही वरदान दिया था। अतएव भरद्वाजजीने सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीका सर्वगुणसम्पन्न—साङ्गोपाङ्ग आतिथ्य-सत्कार किया है॥ २७ १/२ ॥

'किंतु देखिये, अब हर्षसे भरे हुए वानरोंका भयंकर कोलाहल सुनायी देता है। मालूम होता है इस समय वानरसेना गोमतीको पार कर रही है॥ २८ १/२ ॥

'उधर सालवनकी ओर देखिये, कैसी धूलकी वर्षा हो रही है? मैं समझता हूँ वानरलोग रमणीय सालवनको आन्दोलित कर रहे हैं॥ २९ १/२ ॥

'लीजिये, यह रहा पुष्पकविमान, जो दूरसे चन्द्रमाके समान दिखायी देता है। इस दिव्य पुष्पकविमानको विश्वकर्माने अपने मनके संकल्पसे ही रचा था। महात्मा श्रीरामने रावणको बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर इसे प्राप्त किया है॥ ३०-३१ ॥

'श्रीरामका वाहन बना हुआ यह विमान प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा है। इसका वेग मनके समान है। यह दिव्य विमान ब्रह्माजीकी कृपासे कुबेरको प्राप्त हुआ था॥ ३२ ॥

'इसीमें विदेहराजकुमारी सीताके साथ वे दोनों रघुवंशी वीर बन्धु बैठे हैं और इसीमें महातेजस्वी सुग्रीव तथा राक्षस विभीषण भी विराजमान हैं'॥ ३३ ॥

हनुमान्‌जीके इतना कहते ही स्त्रियों, बालकों, नौजवानों और बूढ़ों—सभी पुरवासियोंके मुखसे यह वाणी फूट पड़ी—'अहो! ये श्रीरामचन्द्रजी आ रहे हैं।' उन नागरिकोंका वह हर्षनाद स्वर्गलोकतक गूँज उठा॥ ३४ ॥