भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2318

‘दशग्रीव! लौट जाओ। इस पर्वतपर भगवान् शङ्कर क्रीडा करते हैं। यहाँ सुपर्ण, नाग, यक्ष, देवता, गन्धर्व और राक्षस सभी प्राणियोंका आना-जाना बंद कर दिया गया है’॥ १० १/२ ॥

नन्दीकी यह बात सुनकर दशग्रीव कुपित हो उठा। उसके कानोंके कुण्डल हिलने लगे। आँखें रोषसे लाल हो गयीं और वह पुष्पकसे उतरकर बोला— ‘कौन है यह शङ्कर?’ ऐसा कहकर वह पर्वतके मूलभागमें आ गया॥ ११-१२ ॥

वहाँ पहुँचकर उसने देखा, भगवान् शङ्करसे थोड़ी ही दूरपर चमचमाता हुआ शूल हाथमें लिये नन्दी दूसरे शिवकी भाँति खड़े हैं॥ १३ ॥

उनका मुँह वानरके समान था। उन्हें देखकर वह निशाचर उनका तिरस्कार करता हुआ सजल जलधरके समान गम्भीर स्वरमें ठहाका मारकर हँसने लगा॥ १४ ॥

यह देख शिवके दूसरे स्वरूप भगवान् नन्दी कुपित हो वहाँ पास ही खड़े हुए निशाचर दशमुखसे इस प्रकार बोले— ॥ १५ ॥

‘दशानन! तुमने वानररूपमें मुझे देखकर मेरी अवहेलना की है और वज्रपातके समान भयानक अट्टहास किया है; अतः तुम्हारे कुलका विनाश करनेके लिये मेरे ही समान पराक्रम, रूप और तेजसे सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे॥ १६-१७ ॥

‘क्रूर निशाचर! नख और दाँत ही उन वानरोंके अस्त्र होंगे तथा मनके समान उनका तीव्र वेग होगा। वे युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले और अतिशय बलशाली होंगे तथा चलते-फिरते पर्वतोंके समान जान पड़ेंगे॥ १८ ॥

‘वे एकत्र होकर मन्त्री और पुत्रोंसहित तुम्हारे प्रबल अभिमानको और विशालकाय होनेके गर्वको चूर-चूर कर देंगे॥ १९ ॥

‘ओ निशाचर! मैं तुम्हें अभी मार डालनेकी शक्ति रखता हूँ, तथापि तुम्हें मारना नहीं है; क्योंकि अपने कुत्सित कर्मोंद्वारा तुम पहलेसे ही मारे जा चुके हो (अतः मरे हुएको मारनेसे क्या लाभ?)’॥ २० ॥

महामना भगवान् नन्दीके इतना कहते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ २१ ॥

परंतु महाबली दशाननने उस समय नन्दीके उन वचनोंकी कोर्इ परवा नहीं की और उस पर्वतके निकट जाकर कहा— ॥ २२ ॥