श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘पशुपते! जिसके कारण यात्रा करते समय मेरे पुष्पक-विमानकी गति रुक गयी, तुम्हारे उस पर्वतको, जो यह मेरे सामने खड़ा है, मैं जड़से उखाड़ फेंकता हूँ॥
‘किस प्रभावसे शङ्कर प्रतिदिन यहाँ राजाकी भाँति क्रीडा करते हैं? इन्हें इस जाननेयोग्य बातका भी पता नहीं है कि इनके समक्ष भयका स्थान उपस्थित है’॥
श्रीराम! ऐसा कहकर दशग्रीवने पर्वतके निचले भागमें अपनी भुजाएँ लगायीं और उसे शीघ्र उठा लेनेका प्रयत्न किया। वह पर्वत हिलने लगा॥ २५ ॥
पर्वतके हिलनेसे भगवान् शङ्करके सारे गण काँप उठे। पार्वती देवी भी विचलित हो उठीं और भगवान् शङ्करसे लिपट गयीं॥ २६ ॥
श्रीराम! तब देवताओंमें श्रेष्ठ पापहारी महादेवने उस पर्वतको अपने पैरके अँगूठेसे खिलवाड़में ही दबा दिया॥ २७ ॥
फिर तो दशग्रीवकी वे भुजाएँ, जो पर्वतके खंभोंके समान जान पड़ती थीं, उस पहाड़के नीचे दब गयीं। यह देख वहाँ खड़े हुए उस राक्षसके मन्त्री बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ २८ ॥
उस राक्षसने रोष तथा अपनी बाँहोंकी पीड़ाके कारण सहसा बड़े जोरसे विराव—रोदन अथवा आर्तनाद किया, जिससे तीनों लोकोंके प्राणी काँप उठे॥ २९ ॥
उसके मन्त्रियोंने समझा, अब प्रलयकाल आ गया और विनाशकारी वज्रपात होने लगा है। उस समय इन्द्र आदि देवता मार्गमें विचलित हो उठे॥ ३० ॥
समुद्रोंमें ज्वार आ गया। पर्वत हिलने लगे और यक्ष, विद्याधर तथा सिद्ध एक-दूसरेसे पूछने लगे—‘यह क्या हो गया?’॥ ३१ ॥
तदनन्तर दशग्रीवके मन्त्रियोंने उससे कहा—‘महाराज दशानन! अब आप नीलकण्ठ उमावल्लभ महादेवजीको संतुष्ट कीजिये। उनके सिवा दूसरे किसीको हम ऐसा नहीं देखते, जो यहाँ आपको शरण दे सके॥ ३२ ॥
‘आप स्तुतियोंद्वारा उन्हें प्रणाम करके उन्हींकी शरणमें जाइये। भगवान् शङ्कर बड़े दयालु हैं। वे संतुष्ट होकर आपपर कृपा करेंगे’॥ ३३ ॥
मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर दशमुख रावणने भगवान् वृषभध्वजको प्रणाम करके नाना प्रकारके स्तोत्रों तथा सामवेदोक्त मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन किया। इस प्रकार हाथोंकी पीड़ासे रोते और स्तुति करते हुए उस राक्षसके एक हजार वर्ष बीत गये॥ ३४ ॥