भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2328

नरेश्वर श्रीराम! इस वरदानके पहले मोरोंके पंख केवल नीले रंगके ही होते थे। देवराजसे उक्त वर पाकर सब मयूर वहाँसे चले गये॥ २५॥

श्रीराम! तदनन्तर धर्मराजने प्राग्वंशकी* छतपर बैठे हुए कौएसे कहा—‘पक्षी! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। प्रसन्न होकर जो कुछ कहता हूँ, मेरे इस वचनको सुनो॥ २६॥

‘जैसे दूसरे प्राणियोंको मैं नाना प्रकारके रोगोंद्वारा पीड़ित करता हूँ, वे रोग मेरी प्रसन्नताके कारण तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे; इसमें संशय नहीं है॥ २७॥

‘विहङ्गम! मेरे वरदानसे तुम्हें मृत्युका भय नहीं होगा। जबतक मनुष्य आदि प्राणी तुम्हारा वध नहीं करेंगे, तबतक तुम जीवित रहोगे॥ २८॥

‘मेरे राज्य—यमलोकमें स्थित रहकर जो मानव भूखसे पीड़ित हैं, उनके पुत्र आदि इस भूतलपर जब तुम्हें भोजन करावेंगे, तब वे बन्धु-बान्धवोंसहित परम तृप्त होंगे’॥ २९॥

तत्पश्चात् वरुणने गङ्गाजीके जलमें विचरनेवाले हंसको सम्बोधित करके कहा—‘पक्षिराज! मेरा प्रेमपूर्ण वचन सुनो—॥ ३०॥

‘तुम्हारे शरीरका रंग चन्द्रमण्डल तथा शुद्ध फेनके समान परम उज्ज्वल, सौम्य एवं मनोरम होगा॥ ३१॥

‘मेरे अङ्गभूत जलका आश्रय लेकर तुम सदा कान्तिमान् बने रहोगे और तुम्हें अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होगी। यही मेरे प्रेमका परिचायक चिह्न होगा’॥ ३२॥

श्रीराम! पूर्वकालमें हंसोंका रंग पूर्णतः श्वेत नहीं था। उनकी पाँखोंका अग्रभाग नीला और दोनों भुजाओंके बीचका भाग नूतन दूर्वादलके अग्रभाग-सा कोमल एवं श्याम वर्णसे युक्त होता था॥ ३३॥

तदनन्तर विश्रवाके पुत्र कुबेरने पर्वतशिखरपर बैठे हुए कृकलास (गिरगिट)-से कहा—‘मैं प्रसन्न होकर तुम्हें सुवर्णके समान सुन्दर रंग प्रदान करता हूँ॥ ३४॥

‘तुम्हारा सिर सदा ही सुवर्णके समान रंगका एवं अक्षय होगा। मेरी प्रसन्नतासे तुम्हारा यह (काला) रंग सुनहरे रंगमें परिवर्तित हो जायगा’॥ ३५॥

इस प्रकार उन्हें उत्तम वर देकर वे सब देवता वह यज्ञोत्सव समाप्त होनेपर राजा मरुत्तके साथ पुनः अपने भवन—स्वर्गलोकको चले गये॥ ३६॥