भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2497, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2497

कोई नहीं देख पाते थे। वे सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य थे। वीर! उसी समय उन भगवान् नारायणने ही कुपित हो दुरात्मा मधु और कैटभके विनाश तथा समस्त राक्षसोंके संहारके लिये इस दिव्य, उत्तम एवं अमोघ बाणकी सृष्टि की थी। उस समय वे तीनों लोकोंकी सृष्टि करना चाहते थे और मधु, कैटभ तथा अन्य सब राक्षस उसमें विघ्न उपस्थित कर रहे थे। अतः भगवान्‌ने इसी बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको युद्धमें मारा था। इस मुख्य बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको मारकर भगवान्‌ने जीवोंके कर्मफलभोगकी सिद्धिके लिये विभिन्न लोकोंकी रचना की॥ २०—२३ ॥

‘शत्रुघ्न! पहले मैंने रावणका वध करनेके लिये भी इस बाणका प्रयोग नहीं किया था; क्योंकि इसके द्वारा बहुत-से प्राणियोंके नष्ट हो जानेकी आशङ्का थी॥ २४ ॥

‘लवणके पास जो महात्मा महादेवजीका शत्रुविनाशके लिये दिया हुआ मधुका दिव्य, उत्तम एवं महान् शूल है, उसका वह प्रतिदिन बारंबार पूजन करता है और उसे महलमें ही गुप्तरूपसे रखकर समस्त दिशाओंमें जा-जाकर अपने लिये उत्तम आहारका संग्रह करता है॥ २५-२६ ॥

‘जब कोई युद्धकी इच्छा रखकर उसे ललकारता है, तब वह राक्षस उस शूलको लेकर अपने विपक्षीको भस्म कर देता है॥ २७ ॥

‘पुरुषसिंह! जिस समय वह शूल उसके पास न हो और वह नगरमें भी न पहुँच सका हो, उसी समय पहलेसे ही नगरके द्वारपर जाकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये उसकी प्रतीक्षामें डटे रहो॥ २८ ॥

‘महाबाहु पुरुषोत्तम! यदि उस राक्षसको महलमें घुसनेसे पहले ही तुम युद्धके लिये ललकारोगे, तब अवश्य उसका वध कर सकोगे॥ २९ ॥

‘ऐसा न करनेपर वह अवध्य हो जायगा। वीर! यदि तुमने ऐसा किया तो उस राक्षसका विनाश होकर ही रहेगा॥ ३० ॥

‘इस प्रकार मैंने तुम्हें उस शूलसे बचनेका उपाय तथा अन्य सब आवश्यक बातें बता दीं; क्योंकि श्रीमान् भगवान् नीलकण्ठके विधानको पलटना बड़ा कठिन काम है’॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥