श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौंसठवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार शत्रुघ्नका सेनाको आगे भेजकर एक मासके पश्चात् स्वयं भी प्रस्थान करना
शत्रुघ्नजीको इस प्रकार समझाकर और उनकी बारंबार प्रशंसा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः यह बात कही—॥ १ ॥
‘पुरुषप्रवर! ये चार हजार घोड़े, दो हजार रथ, सौ हाथी और रास्तेमें तरह-तरहके सामानकी दूकानें लगानेवाले बनिये लोग विक्रयकी आवश्यक वस्तुओंके साथ तुम्हारे साथ जायँगे। साथ ही मनोरञ्जनके लिये नट और नर्तक भी रहेंगे॥ २-३ ॥
‘पुरुषश्रेष्ठ शत्रुघ्न! तुम दस लाख स्वर्णमुद्रा लेकर जाओ। इस तरह पर्याप्त धन और सवारियाँ अपने साथ रखो॥ ४ ॥
‘इस सेनाका भलीभाँति भरण-पोषण किया गया है। यह हर्ष तथा उत्साहसे पूर्ण, संतुष्ट और उद्दण्डतासे रहित होकर आज्ञाके अधीन रहनेवाली है। नरश्रेष्ठ! इसे मधुर भाषणसे और धन देकर प्रसन्न रखना॥ ५ ॥
‘रघुनन्दन! अत्यन्त प्रसन्न रखे गये सेवक-समूह (सैनिक) जहाँ (जिस संकटकालमें) खड़े होते या साथ देते हैं, वहाँ न तो धन टिक पाता है, न स्त्री ठहर सकती है और न भाई-बन्धु ही खड़े हो सकते हैं (अतः उन सबको सदा संतुष्ट रखना चाहिये)॥ ६ ॥
‘इसलिये हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई इस विशाल सेनाको आगे भेजकर तुम पीछेसे अकेले ही केवल धनुष हाथमें लेकर मधुवनको जाना और इस तरह यात्रा करना, जिससे मधुपुत्र लवणको यह संदेह न हो कि तुम युद्धकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो। तुम्हारी गतिविधिका उसे पता नहीं चलना चाहिये॥ ७-८ ॥
‘पुरुषोत्तम! मैंने जो बताया है, उसके सिवा उसकी मृत्युका दूसरा कोई उपाय नहीं है; क्योंकि जो भी शूलसहित लवणासुरके दृष्टिपथमें आ जाता है, वह अवश्य उसके द्वारा मारा जाता है॥ ९ ॥
‘सौम्य! जब ग्रीष्म-ऋतु निकल जाय और वर्षाकाल आ जाय, उस समय तुम लवणासुरका वध करना; क्योंकि उस दुर्बुद्धि राक्षसके नाशका वही समय है॥ १० ॥