श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘तुम्हारे सैनिक महर्षियोंको आगे करके यहाँसे यात्रा करें, जिससे ग्रीष्म-ऋतु बीतते-बीतते वे गङ्गाजीको पार कर जायँ॥ ११॥
‘शीघ्रपराक्रमी वीर! फिर सारी सेनाको वहीं गङ्गाजीके तटपर ठहराकर तुम धनुषमात्र लेकर पूरी सावधानीके साथ अकेले ही आगे जाना’॥ १२॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शत्रुघ्नजीने अपने प्रधान सेनापतियोंको बुलाया और इस प्रकार कहा— ॥ १३॥
‘देखो, मार्गमें जहाँ-जहाँ डेरा डालना है, उन पड़ावोंका निश्चय कर लिया गया है। तुम्हें वहीं निवास करना होगा। जहाँ भी ठहरो, विरोधभावको मनसे निकाल दो, जिससे किसीको कष्ट न पहुँचे’॥ १४॥
इस प्रकार उन सेनापतियोंको आज्ञा दे अपनी विशाल सेनाको आगे भेजकर शत्रुघ्नने कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयीको प्रणाम किया॥ १५॥
तत्पश्चात् श्रीरामकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर हाथ जोड़कर भरत और लक्ष्मणकी भी वन्दना की॥ १६॥
तदनन्तर मनको संयममें रखकर शत्रुघ्नने पुरोहित वसिष्ठको नमस्कार किया। फिर श्रीरामकी आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली शत्रुघ्न अयोध्यासे निकले॥ १७॥
गजराजों और श्रेष्ठ अश्वोंके समुदायसे भरी हुई विशाल सेनाको आगे भेजकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले शत्रुघ्न एक मासतक महाराज श्रीरामके पास ही रहे। उसके बाद उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया॥ १८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥