श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2500, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपैंसठवाँ सर्ग
महर्षि वाल्मीकिका शत्रुघ्नको सुदासपुत्र कल्माषपादकी कथा सुनाना
अपनी सेनाको आगे भेजकर अयोध्यामें एक माह रहनेके पश्चात् शत्रुघ्न अकेले ही वहाँसे मधुवनके मार्गपर प्रस्थित हुए। वे बड़ी तेजीके साथ आगे बढ़ने लगे॥ १ ॥
रघुकुलको आनन्दित करनेवाले शूरवीर शत्रुघ्न रास्तेमें दो रात बिताकर तीसरे दिन महर्षि वाल्मीकिके पवित्र आश्रमपर जा पहुँचे। वह सबसे उत्तम वासस्थान था॥ २ ॥
वहाँ उन्होंने हाथ जोड़ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वाल्मीकिको प्रणाम करके यह बात कही— ॥ ३ ॥
‘भगवन्! मैं अपने बड़े भाई श्रीरघुनाथजीके कार्यसे इधर आया हूँ। आज रातको यहाँ ठहरना चाहता हूँ और कल सबेरे वरुणदेवद्वारा पालित पश्चिम दिशाको चला जाऊँगा’॥ ४ ॥
शत्रुघ्नकी यह बात सुनकर मुनिवर वाल्मीकिने उन महात्माको हँसते हुए उत्तर दिया—‘महायशस्वी वीर! तुम्हारा स्वागत है॥ ५ ॥
‘सौम्य! यह आश्रम रघुवंशियोंके लिये अपना ही घर है। तुम निःशङ्क होकर मेरी ओरसे आसन, पाद्य और अर्घ्य स्वीकार करो’॥ ६ ॥
तब वह सत्कार ग्रहण करके शत्रुघ्नने फल-मूलका भोजन किया। इससे उन्हें बड़ी तृप्ति हुई॥ ७ ॥
फल-मूल खाकर वे महर्षिसे बोले—‘मुने! इस आश्रमके निकट जो यह प्राचीनकालका यज्ञ-वैभव (यूप आदि उपकरण) दिखायी देता है, किसका है— किस यजमान नरेशने यहाँ यज्ञ किया था?’॥ ८ ॥
उनका यह प्रश्न सुनकर वाल्मीकिजीने कहा— ‘शत्रुघ्न! पूर्वकालमें जिस यजमान नरेशका यह यज्ञमण्डप रहा है, उसे बताता हूँ, सुनो॥ ९ ॥
‘तुम्हारे पूर्वज राजा सुदास इस भूमण्डलके स्वामी हो गये हैं। उन भूपालके वीरसह (मित्रसह) नामक एक पुत्र हुआ, जो बड़ा पराक्रमी और अत्यन्त धर्मात्मा था॥ १० ॥
‘सुदासका वह शूरवीर पुत्र बाल्यावस्थामें ही एक दिन शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ उसने दो राक्षस देखे, जो सब ओर बारंबार विचर रहे थे॥ ११ ॥