भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

तदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशामें जाकर उन सगरकुमारोंने एक साथ होकर रोषपूर्वक पृथ्वीको खोदना आरम्भ किया॥ २४ ॥

इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारोंने वहाँ सनातन वासुदेवस्वरूप भगवान् कपिलको देखा॥ २५ ॥

राजा सगरके यज्ञका वह घोड़ा भी भगवान् कपिलके पास ही चर रहा था। रघुनन्दन! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ २६ ॥

भगवान् कपिलको अपने यज्ञमें विघ्न डालनेवाला जानकर उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उन्होंने अपने हाथोंमें खंती, हल और नाना प्रकारके वृक्ष एवं पत्थरोंके टुकड़े ले रखे थे॥ २७ ॥

वे अत्यन्त रोषमें भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले— ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। तू ही हमारे यज्ञके घोड़ेको यहाँ चुरा लाया है। दुर्बुद्धे! अब हम आ गये। तू समझ ले, हम महाराज सगरके पुत्र हैं’॥ २८ १/२ ॥

रघुनन्दन! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिलको बड़ा रोष हुआ और उस रोषके आवेशमें ही उनके मुँहसे एक हुंकार निकल पड़ा॥ २९ १/२ ॥

श्रीराम! उस हुंकारके साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने उन सभी सगरपुत्रोंको जलाकर राखका ढेर कर दिया॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥