श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशामें जाकर उन सगरकुमारोंने एक साथ होकर रोषपूर्वक पृथ्वीको खोदना आरम्भ किया॥ २४ ॥
इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारोंने वहाँ सनातन वासुदेवस्वरूप भगवान् कपिलको देखा॥ २५ ॥
राजा सगरके यज्ञका वह घोड़ा भी भगवान् कपिलके पास ही चर रहा था। रघुनन्दन! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ २६ ॥
भगवान् कपिलको अपने यज्ञमें विघ्न डालनेवाला जानकर उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उन्होंने अपने हाथोंमें खंती, हल और नाना प्रकारके वृक्ष एवं पत्थरोंके टुकड़े ले रखे थे॥ २७ ॥
वे अत्यन्त रोषमें भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले— ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। तू ही हमारे यज्ञके घोड़ेको यहाँ चुरा लाया है। दुर्बुद्धे! अब हम आ गये। तू समझ ले, हम महाराज सगरके पुत्र हैं’॥ २८ १/२ ॥
रघुनन्दन! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिलको बड़ा रोष हुआ और उस रोषके आवेशमें ही उनके मुँहसे एक हुंकार निकल पड़ा॥ २९ १/२ ॥
श्रीराम! उस हुंकारके साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने उन सभी सगरपुत्रोंको जलाकर राखका ढेर कर दिया॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥