भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2502

‘महाराजकी इस आज्ञाको सुनते ही रसोइयेके मनमें बड़ी घबराहट पैदा हो गयी (वह सोचने लगा, आज गुरुजी अभक्ष्य-भक्षणमें कैसे प्रवृत्त होंगे)। यह देख फिर उस राक्षसने ही रसोइयेका वेष बना लिया॥ २४॥

‘उसने मनुष्यका मांस लाकर राजाको दे दिया और कहा—‘यह मांसयुक्त अन्न एवं हविष्य लाया हूँ। यह बड़ा ही स्वादिष्ट है’॥ २५॥

‘नरश्रेष्ठ! अपनी पत्नी रानी मदयन्तीके साथ राजा मित्रसहने राक्षसके लाये हुए उस मांसयुक्त भोजनको वसिष्ठजीके सामने रखा॥ २६॥

‘थालीमें मानव-मांस परोसा गया है, यह जानकर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महान् क्रोधसे भर गये और इस प्रकार बोले—॥ २७॥

‘“राजन्! तुम मुझे ऐसा भोजन देना चाहते हो, इसलिये यही तुम्हारा भोजन होगा; इसमें संशय नहीं है (अर्थात् तुम मनुष्यभक्षी राक्षस हो जाओगे)’॥ २८॥

‘यह सुनकर सौदासने भी कुपित हो हाथमें जल ले लिया और वसिष्ठ मुनिको शाप देना आरम्भ किया। तबतक उनकी पत्नीने उन्हें रोक दिया॥ २९॥

‘वे बोलीं—‘राजन्! भगवान् वसिष्ठ मुनि हम सबके स्वामी हैं; अतः आप अपने देवतुल्य पुरोहितको बदलेमें शाप नहीं दे सकते’॥ ३०॥

‘तब धर्मात्मा राजाने तेज और बलसे सम्पन्न उस क्रोधमय जलको नीचे डाल दिया। उससे अपने दोनों पैरोंको ही सींच लिया॥ ३१॥

ऐसा करनेसे राजाके दोनों पैर तत्काल चितकबरे हो गये। तभीसे महायशस्वी राजा सौदास कल्माषपाद (चितकबरे पैरवाले) हो गये और उसी नामसे उनकी ख्याति हुई॥ ३२ १/२ ॥

‘तदनन्तर पत्नीसहित राजाने बारंबार प्रणाम करके फिर वसिष्ठसे कहा—‘ब्रह्मर्षे! आपहीका रूप धारण करके किसीने मुझे ऐसा भोजन देनेके लिये प्रेरित किया था’॥ ३३॥

‘राजाधिराज मित्रसहकी वह बात सुनकर और उसे राक्षसकी करतूत जानकर वसिष्ठने पुनः उस नरश्रेष्ठ नरेशसे कहा—॥ ३४॥

‘“राजन्! मैंने रोषसे भरकर जो बात कह दी है, इसे व्यर्थ नहीं किया जा सकता; परंतु इससे छूटनेके लिये मैं तुम्हें एक वर दूँगा॥ ३५॥