श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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‘राजेन्द्र! वह वर इस प्रकार है—यह शाप बारह वर्षोंतक रहेगा। उसके बाद इसका अन्त हो जायगा। मेरी कृपासे तुम्हें बीती हुई बातका स्मरण नहीं रहेगा’॥
‘इस प्रकार उस शत्रुसूदन राजाने बारह वर्षोंतक उस शापको भोगकर पुनः अपना राज्य पाया और प्रजाजनोंका निरन्तर पालन किया॥ ३७ ॥
‘रघुनन्दन! उन्हीं राजा कल्माषपादके यज्ञका यह सुन्दर स्थान मेरे इस आश्रमके समीप दिखायी देता है, जिसके विषयमें तुम पूछ रहे थे’॥ ३८ ॥
महाराज मित्रसहकी उस अत्यन्त दारुण कथाको सुनकर शत्रुघ्नने महर्षिको प्रणाम करके पर्णशालामें प्रवेश किया॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥