श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुक्राचार्यकी यह बात सुनकर आश्रमवासी मनुष्य उस राज्यसे निकल गये और सीमासे बाहर जाकर निवास करने लगे॥ १२ ॥
आश्रमवासी मुनियोंसे ऐसी बात कहकर शुक्रने अरजासे कहा— ‘खोटी बुद्धिवाली लड़की! तू यहीं इस आश्रममें मनको परमात्माके ध्यानमें एकाग्र करके रह॥ १३ ॥
‘अरजे! यह जो एक योजन फैला हुआ सुन्दर तालाब है, इसका तू निश्चिन्त होकर उपभोग कर और अपने अपराधकी निवृत्तिके लिये यहाँ समयकी प्रतीक्षा करती रह॥ १४ ॥
‘जो जीव उन रात्रियोंमें तुम्हारे समीप रहेंगे, वे कभी भी धूलकी वर्षासे मारे नहीं जायँगे— सदा बने रहेंगे'॥
ब्रह्मर्षिका यह आदेश सुनकर वह भृगुकन्या अरजा अत्यन्त दुःखित होनेपर भी अपने पिता भार्गवसे बोली— ‘बहुत अच्छा'॥ १६ ॥
ऐसा कहकर शुक्रने दूसरे राज्यमें जाकर निवास किया तथा उन ब्रह्मवादीके कथनानुसार राजा दण्डका वह राज्य सेवक, सेना और सवारियोंसहित सात दिनमें भस्म हो गया॥ १७ १/२ ॥
नरेश्वर! विन्ध्य और शैवलगिरिके मध्यभागमें दण्डका राज्य था। काकुत्स्थ! धर्मयुग कृतयुगमें धर्मविरुद्ध आचरण करनेपर उन ब्रह्मर्षिने राजा और उनके देशको शाप दे दिया। तभीसे वह भूभाग दण्डकारण्य कहलाता है॥ १८-१९ ॥
इस स्थानपर तपस्वीलोग आकर बस गये; इसलिये इसका नाम जनस्थान हो गया। रघुनन्दन! आपने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, यह सब मैंने कह सुनाया॥ २० ॥
वीर! अब संध्योपासनाका समय बीता जा रहा है। पुरुषसिंह! सब ओरसे ये सब महर्षि स्नान कर चुकनेके बाद भरे हुए घड़े लेकर सूर्यदेवकी उपासना कर रहे हैं॥ २१ १/२ ॥
श्रीराम! वे सूर्य वहाँ एकत्र हुए उन उत्तम ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा पढ़े गये ब्राह्मणमन्त्रोंको सुनकर और उसी रूपमें पूजा पाकर अस्ताचलको चले गये। अब आप भी जायँ और आचमन एवं स्नान आदि करें॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८१ ॥