भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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बयासीवाँ सर्ग

श्रीरामका अगस्त्य-आश्रमसे अयोध्यापुरीको लौटना

ऋषिका यह आदेश पाकर श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करनेके लिये अप्सराओंसे सेवित उस पवित्र सरोवरके तटपर गये॥ १ ॥

वहाँ आचमन और सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने पुनः महात्मा कुम्भजके आश्रममें प्रवेश किया॥ २ ॥

अगस्त्यजीने उनके भोजनके लिये अनेक गुणोंसे युक्त कन्द, मूल, जरावस्थाको निवारण करनेवाली दिव्य ओषधि, पवित्र भात आदि वस्तुएँ अर्पित कीं॥ ३ ॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम वह अमृततुल्य स्वादिष्ट भोजन करके परम तृप्त और प्रसन्न हुए तथा वह रात्रि उन्होंने बड़े संतोषसे बितायी॥ ४ ॥

सबेरे उठकर शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलभूषण श्रीराम नित्यकर्म करके वहाँसे जानेकी इच्छासे महर्षिके पास गये॥ ५ ॥

वहाँ महर्षि कुम्भजको प्रणाम करके श्रीरामने कहा— ‘महर्षे! अब मैं अपनी पुरीको जानेके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ। कृपया मुझे आज्ञा प्रदान करें॥ ६ ॥

‘आप महात्माके दर्शनसे मैं धन्य और अनुगृहीत हुआ। अब अपने-आपको पवित्र करनेके लिये फिर कभी आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आऊँगा’॥ ७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार अद्भुत वचन कहनेपर धर्मचक्षु तपोधन अगस्त्यजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे बोले—॥ ८ ॥

‘श्रीराम! आपके ये सुन्दर वचन बड़े अद्भुत हैं। रघुनन्दन! समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाले तो आप ही हैं॥ ९ ॥

‘श्रीराम! जो कोऽइ एक मुहूर्तके लिये भी आपका दर्शन पा जाते हैं, वे पवित्र, स्वर्गके अधिकारी तथा देवताओंके लिये भी पूजनीय हो जाते हैं॥ १० ॥

‘इस भूतलपर जो प्राणी आपको क्रूर दृष्टिसे देखते हैं, वे यमराजके दण्डसे पीटे जाकर तत्काल नरकमें गिरते हैं॥ ११ ॥