श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टिसे आपको देखते हैं॥ १२ ॥
‘राजन्! महाबली रघुनन्दन! पुत्र जैसे पिताको देखते हैं, उसी प्रकार आपके प्रति सब राजाओंका भाव है। आप ही समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण प्राणियोंके भी आश्रय हैं॥
‘नरेश्वर! फिर आप ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं, जिसमें भूमण्डलके समस्त राजवंशोंका विनाश दिखायी देता है॥ १३ ॥
‘राजन्! पृथ्वीपर जो पुरुषार्थी पुरुष हैं, उन सबका सभीके कोपसे उस यज्ञमें संहार हो जायगा॥ १४ ॥
‘पुरुषसिंह! अतुल पराक्रमी वीर! आपके सद्गुणोंके कारण सारा जगत् आपके वशमें है। आपके लिये इस भूतलके निवासियोंका विनाश करना उचित न होगा'॥ १५ ॥
भरतका यह अमृतमय वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ १६ ॥
उन्होंने कैकेयीनन्दन भरतसे यह शुभ बात कही— ‘निष्पाप भरत! आज तुम्हारी बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न एवं संतुष्ट हुआ हूँ॥ १७ ॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हारे मुखसे निकला हुआ यह उदार एवं धर्मसंगत वचन सारी पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला है॥
‘धर्मज्ञ! मेरे हृदयमें राजसूय-यज्ञका संकल्प उठ रहा था; किंतु आज तुम्हारे इस सुन्दर भाषणको सुनकर मैं उस उत्तम यज्ञकी ओरसे अपने मनको हटाये लेता हूँ॥ १९ ॥
‘लक्ष्मणके बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये जो सम्पूर्ण जगत्को पीड़ा देनेवाला हो। बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारे उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यानसे सुना है’॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८३ ॥