भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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चौरासीवाँ सर्ग

लक्ष्मणका अश्वमेध-यज्ञका प्रस्ताव करते हुए इन्द्र और वृत्रासुरकी कथा सुनाना, वृत्रासुरकी तपस्या और इन्द्रका भगवान् विष्णुसे उसके वधके लिये अनुरोध

श्रीराम और महात्मा भरतके इस प्रकार बातचीत करनेपर लक्ष्मणने रघुकुलनन्दन श्रीरामसे यह शुभ बात कही— ॥ १ ॥

‘रघुनन्दन! अश्वमेध नामक महान् यज्ञ समस्त पापोंको दूर करनेवाला, परमपावन और दुष्कर है। अतः इसका अनुष्ठान आप पसंद करें॥ २ ॥

‘महात्मा इन्द्रके विषयमें यह प्राचीन वृत्तान्त सुननेमें आता है कि इन्द्रको जब ब्रह्महत्या लगी थी, तब वे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान करके ही पवित्र हुए थे॥ ३ ॥

‘महाबाहो! पहलेकी बात है, जब देवता और असुर परस्पर मिलकर रहते थे, उन दिनों वृत्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा असुर रहता था। लोकमें उसका बड़ा आदर था॥ ४ ॥

‘वह सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन ऊँचा था। वह तीनों लोकोंको आत्मीय समझकर प्यार करता था और सबको स्नेहभरी दृष्टिसे देखता था॥ ५ ॥

‘उसे धर्मका यथार्थ ज्ञान था। वह कृतज्ञ और स्थिरप्रज्ञ था तथा पूर्णतः सावधान रहकर धन-धान्यसे भरी-पूरी पृथ्वीका धर्मपूर्वक शासन करता था॥ ६ ॥

‘उसके शासनकालमें पृथ्वी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली थी। यहाँ फल, फूल और मूल सभी सरस होते थे॥ ७ ॥

‘महात्मा वृत्रासुरके राज्यमें यह भूमि बिना जोते-बोये ही अन्न उत्पन्न करती तथा धन-धान्यसे भलीभाँति सम्पन्न रहती थी। इस प्रकार वह असुर समृद्धिशाली एवं अद्भुत राज्यका उपभोग करता था॥ ८ ॥

‘एक समय वृत्रासुरके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है। दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है॥ ९ ॥

‘उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मधुरेश्वरको* राजा बना पुरवासियोंको सौंप दिया और सम्पूर्ण देवताओंको ताप देता हुआ वह कठोर तपस्या करने लगा॥ १० ॥