भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पचासीवाँ सर्ग

भगवान् विष्णुके तेजका इन्द्र और वज्र आदिमें प्रवेश, इन्द्रके वज्रसे वृत्रासुरका वध तथा ब्रह्महत्याग्रस्त इन्द्रका अन्धकारमय प्रदेशमें जाना

लक्ष्मणका यह कथन सुनकर शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सुमित्राकुमार! वृत्रासुरके वधकी पूरी कथा कह सुनाओ'॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर उत्तम व्रतके पालक सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने पुनः उस दिव्य कथाको सुनाना आरम्भ किया—॥ २॥

“प्रभो! सहस्रनेत्रधारी इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंकी वह प्रार्थना सुनकर भगवान् विष्णुने इन्द्र आदि सब देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ ३॥

“देवताओ! तुम्हारी इस प्रार्थनाके पहलेसे ही मैं महामना वृत्रासुरके स्नेह-बन्धनमें बँधा हुआ हूँ। इसलिये तुम्हारा प्रिय करनेके उद्देश्यसे मैं उस महान् असुरका वध नहीं करूँगा॥ ४॥

“परंतु तुम सबके उत्तम सुखकी व्यवस्था करना मेरा आवश्यक कर्तव्य है; इसलिये मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे देवराज इन्द्र उसका वध कर सकेंगे॥ ५॥

“सुरश्रेष्ठगण! मैं अपने स्वरूपभूत तेजको तीन भागोंमें विभक्त करूँगा, जिससे इन्द्र निस्संदेह वृत्रासुरका वध कर डालेंगे॥ ६॥

“मेरे तेजका एक अंश इन्द्रमें प्रवेश करे, दूसरा वज्रमें व्याप्त हो जाय और तीसरा भूतलको चला जाय* तब इन्द्र वृत्रासुरका वध कर सकेंगे'॥ ७॥

‘देवेश्वर भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर देवता बोले—'दैत्यविनाशन! आप जो कहते हैं, ठीक ऐसी ही बात है, इसमें संदेह नहीं। आपका कल्याण हो। हमलोग वृत्रासुरके वधकी इच्छा मनमें लिये यहाँसे लौट जायँगे। परम उदार प्रभो! आप अपने तेजके द्वारा देवराज इन्द्रको अनुगृहीत करें'॥ ८-९॥

‘तत्पश्चात् इन्द्र आदि सभी महामनस्वी देवता उस वनमें गये, जहाँ महान् असुर वृत्र तपस्या करता था॥

‘उन्होंने देखा, असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहा है और ऐसी तपस्या कर रहा है, मानो उसके द्वारा तीनों लोकोंको पी जायगा और आकाशको भी दग्ध कर डालेगा॥