श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2553, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें११ ॥
‘उस असुरश्रेष्ठ वृत्रको देखते ही देवतालोग घबरा गये और सोचने लगे—‘हम कैसे इसका वध करेंगे? और किस उपायसे हमारी पराजय नहीं होने पायेगी?’॥
‘वे लोग वहाँ इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने दोनों हाथोंसे वज्र उठाकर उसे वृत्रासुरके मस्तकपर दे मारा॥ १३ ॥
‘इन्द्रका वह वज्र प्रलयकालकी अग्निके समान भयंकर और दीप्तिमान् था। उससे बड़ी भारी लपटें उठ रही थीं। उसकी चोटसे कटकर जब वृत्रासुरका मस्तक गिरा, तब सारा संसार भयभीत हो उठा॥ १४ ॥
‘निरपराध वृत्रासुरका वध करना उचित नहीं था, अतः उसके कारण महायशस्वी देवराज इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और तुरंत ही सब लोकोंके अन्तमें लोकालोक पर्वतसे परवर्ती अन्धकारमय प्रदेशमें चले गये॥ १५ ॥
‘जानेके समय ब्रह्महत्या तत्काल उनके पीछे लग गयी और उनके अङ्गोंपर टूट पड़ी। इससे इन्द्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ॥ १६ ॥
‘देवताओंका शत्रु मारा गया। इसलिये अग्नि आदि सब देवता त्रिभुवनके स्वामी भगवान् विष्णुकी बार-बार स्तुति-पूजा करने लगे। परंतु उनके इन्द्र अदृश्य हो गये थे (इसके कारण उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था)॥ १७ ॥
(देवता बोले—) ‘परमेश्वर! आप ही जगत्के आश्रय और आदि पिता हैं। आपने सम्पूर्ण प्राणियोंकी रक्षाके लिये विष्णुरूप धारण किया है॥ १८ ॥
‘आपने ही इस वृत्रासुरका वध किया है। परंतु ब्रह्महत्या इन्द्रको कष्ट दे रही है; अतः सुरश्रेष्ठ! आप उनके उद्धारका कोई उपाय बताइये’॥ १९ ॥
‘देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले—‘इन्द्र मेरा ही यजन करें। मैं उन वज्रधारी देवराज इन्द्रको पवित्र कर दूँगा॥ २० ॥
“पवित्र अश्वमेध-यज्ञके द्वारा मुझ यज्ञ-पुरुषकी आराधना करके पाकशासन इन्द्र पुनः देवेन्द्रपदको प्राप्त कर लेंगे और फिर उन्हें किसीसे भय नहीं रहेगा’॥ २१ ॥
‘देवताओंके समक्ष अमृतमयी वाणीद्वारा उक्त संदेश देकर देवेश्वर भगवान् विष्णु अपनी स्तुति सुनते हुए परम धामको चले गये॥ २२ ॥