श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५ ॥
* वृत्र-वधके पश्चात् इन्द्रको लगी हुई ब्रह्महत्याकी निवृत्तिके समयतक इस भूतलकी रक्षा करनेके लिये तथा वृत्रके धराशायी होनेपर उसके भारी शरीरको धारण करनेकी शक्ति देनेके लिये भगवान्के तेजके तीसरे अंशका भूतलपर आना आवश्यक था; इसलिये ऐसा हुआ।