भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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छियासीवाँ सर्ग

इन्द्रके बिना जगत्में अशान्ति तथा अश्वमेधके अनुष्ठानसे इन्द्रका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना

उस समय वृत्रासुरके वधकी पूरी कथा सुनाकर नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने शेष कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ १ ॥

‘देवताओंको भय देनेवाले महापराक्रमी वृत्रासुरके मारे जानेपर ब्रह्महत्यासे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्रको बहुत देरतक होश नहीं हुआ॥ २ ॥

‘लोकोंकी अन्तिम सीमाका आश्रय ले वे सर्पके समान लोटते हुए कुछ कालतक वहाँ अचेत और संज्ञाशून्य होकर पड़े रहे॥ ३ ॥

‘इन्द्रके अदृश्य हो जानेसे सारा संसार व्याकुल हो उठा। धरती उजाड़-सी हो गयी। इसकी आर्द्रता नष्ट हो गयी और वन सूख गये। समस्त सरों और सरिताओंमें जलस्रोतका अभाव हो गया और वर्षा न होनेसे सब जीवोंमें बड़ी घबराहट फैल गयी॥ ४-५ ॥

‘समस्त लोक क्षीण होने लगे। इससे देवताओंके हृदयमें व्याकुलता छा गयी और उन्होंने उसी यज्ञका स्मरण किया, जिसे पहले भगवान् विष्णुने बताया था॥

‘तदनन्तर बृहस्पतिजीको साथ ले ऋषियोंसहित सब देवता उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र भयसे मोहित होकर छिपे हुए थे॥ ७ ॥

‘वे इन्द्रको ब्रह्महत्यासे आवेष्टित देख उन्हीं देवेश्वरको आगे करके अश्वमेध-यज्ञ करने लगे॥ ८ ॥

‘नरेश्वर! फिर तो महामनस्वी महेन्द्रका वह महान् अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ हो गया। उसका उद्देश्य था ब्रह्महत्याकी निवृत्ति करके इन्द्रको पवित्र बनाना॥ ९ ॥

‘तत्पश्चात् जब वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब ब्रह्महत्याने महामनस्वी देवताओंके निकट आकर पूछा— ‘मेरे लिये कहाँ स्थान बनाओगे?’॥ १० ॥

‘यह सुनकर संतुष्ट एवं प्रसन्न हुए देवताओंने उससे कहा— ‘दुर्जय शक्तिवाली ब्रह्महत्ये! तू अपने-आपको स्वयं ही चार भागोंमें विभक्त कर दे’॥ ११ ॥

‘महामनस्वी देवताओंका यह कथन सुनकर महेन्द्रके शरीरमें दुःखपूर्वक निवास करनेवाली ब्रह्महत्याने अपना चार भाग कर दिया और इन्द्रके शरीरसे अन्यत्र रहनेके लिये स्थान माँगा॥ १२