श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सौ नवाँ सर्ग
परमधाम जानेके लिये निकले हुए श्रीरामके साथ समस्त अयोध्यावासियोंका प्रस्थान
तदनन्तर रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब विशाल वक्षःस्थलवाले महायशस्वी कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी पुरोहितसे बोले—॥ १ ॥
‘मेरे अग्निहोत्रकी प्रज्वलित आग ब्राह्मणोंके साथ आगे-आगे चले। महाप्रयाणके पथपर इस यात्राके समय मेरे वाजपेय-यज्ञका सुन्दर छत्र भी चलना चाहिये’॥ २ ॥
उनके इस प्रकार कहनेपर तेजस्वी वसिष्ठ मुनिने महाप्रस्थानकालके लिये उचित समस्त धार्मिक क्रियाओंका विधिपूर्वक पूर्णतः अनुष्ठान किया॥ ३ ॥
फिर भगवान् श्रीराम सूक्ष्म वस्त्र धारण किये दोनों हाथोंमें कुश लेकर परब्रह्मके प्रतिपादक वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सरयूनदीके तटपर चले॥ ४ ॥
उस समय वे वेदपाठके सिवा कहीं किसीसे और कोई बात नहीं करते थे। चलनेके अतिरिक्त उनमें कोई दूसरी चेष्टा नहीं दिखायी देती थी तथा वे लौकिक सुखका परित्याग करके देदीप्यमान सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते हुए घरसे निकले थे और गन्तव्य पथपर बढ़ रहे थे॥ ५ ॥
भगवान् श्रीरामके दाहिने पार्श्वमें कमल हाथमें लिये श्रीदेवी उपस्थित थीं। वामभागमें भूदेवी विराजमान थीं तथा आगे-आगे उनकी व्यवसाय (संहार)-शक्ति चल रही थी॥ ६ ॥
नाना प्रकारके बाण, विशाल एवं उत्तम धनुष तथा दूसरे-दूसरे अस्त्र-शस्त्र—सभी पुरुष-शरीर धारण करके भगवान्के साथ चले॥ ७ ॥
चारों वेद ब्राह्मणका रूप धारण करके चल रहे थे। सबकी रक्षा करनेवाली गायत्री देवी, ओंकार और वषट्कार सभी भक्तिभावसे श्रीरामका अनुसरण करते थे॥
महात्मा ऋषि तथा समस्त ब्राह्मण भी ब्रह्मलोकके खुले हुए द्वारस्वरूप परमात्मा श्रीरामके पीछे-पीछे गये॥
अन्तःपुरकी स्त्रियाँ भी बालकों, वृद्धों, दासियों, खोजों और सेवकोंके साथ निकलकर सरयूतटकी ओर जाते हुए श्रीरामके पीछे-पीछे जा रही थीं॥ १० ॥