भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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भरत और शत्रुघ्न अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अपने आश्रयस्वरूप भगवान् श्रीरामके, जो अग्निहोत्रके साथ जा रहे थे, पीछे-पीछे गये॥ ११ ॥

वे सब महामनस्वी श्रेष्ठ पुरुष एवं ब्राह्मण अग्निहोत्रकी अग्नि तथा स्त्री-पुत्रोंके साथ इस महायात्रामें सम्मिलित हो परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीका अनुगमन कर रहे थे॥ १२ ॥

समस्त मन्त्री और भृत्यवर्ग भी अपने पुत्रों, पशुओं, बन्धुओं तथा अनुचरोंसहित हर्षपूर्वक श्रीरामके पीछे-पीछे जा रहे थे॥ १३ ॥

हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए समस्त प्रजाजन श्रीरघुनाथजीके गुणोंपर मुग्ध थे; इसलिये वे स्त्री, पुरुष, पशु-पक्षी तथा बन्धु-बान्धवोंसहित उस महायात्रामें श्रीरामके अनुगामी हुए। उन सबके हृदयमें प्रसन्नता थी और वे सभी पापसे रहित थे॥ १४-१५ ॥

सम्पूर्ण हृष्ट-पुष्ट वानरगण भी स्नान करके बड़ी प्रसन्नताके साथ किलकारियाँ मारते हुए भगवान् श्रीरामके साथ जा रहे थे, वह सारा समुदाय ही श्रीरामका भक्त था॥ १६ ॥

उनमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो दीन-दुःखी अथवा लज्जित हो। वहाँ एकत्र हुए सब लोगोंके हृदयमें महान् हर्ष छा रहा था और इस प्रकार वह जनसमुदाय अत्यन्त आश्चर्यजनक जान पड़ता था॥ १७ ॥

जनपदके लोगोंमेंसे जो श्रीरामकी यात्रा देखनेके लिये आये थे, वे भी यह सब समारोह देखते ही भगवानके साथ परमधाम जानेको तैयार हो गये॥ १८ ॥

रीछ, वानर, राक्षस और पुरवासी मनुष्य बड़ी भक्तिके साथ श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे एकाग्रचित्त होकर चले आ रहे थे॥ १९ ॥

अयोध्यानगरमें जो अदृश्य प्राणी रहते थे, वे भी साकेतधाम जानेके लिये उद्यत हुए श्रीरघुनाथजीके पीछे-पीछे चल दिये॥ २० ॥

चराचर प्राणियोंमेंसे जो-जो श्रीरघुनाथजीको जाते देखते थे, वे सभी उस यात्रामें उनके पीछे-पीछे चल देते थे॥

उस समय उस अयोध्यामें साँस लेनेवाला कोई छोटे-से-छोटा प्राणी भी रह गया हो, ऐसा नहीं देखा जाता था। तिर्यग्योनिके समस्त जीव भी श्रीराममें भक्तिभाव रखकर उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे॥ २२ ॥