श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९- रावणको देखकर दुःख, भय और चिन्तामें डूबी हुई सीताकी अवस्थाका वर्णन २०- रावणका सीताजीको प्रलोभन २१- सीताजीका रावणको समझाना और उसे श्रीरामके सामने नगण्य बताना २२- रावणका सीताको दो मासकी अवधि देना, सीताका उसे फटकारना, फिर रावणका उन्हें धमकाकर राक्षसियोंके नियन्त्रणमें रखकर स्त्रियोंसहित पुनः महलको लौट जाना २३- राक्षसियोंका सीताजीको समझाना २४- सीताजीका राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार कर देना तथा राक्षसियोंका उन्हें मारने-काटनेकी धमकी देना २५- राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार करके शोक-संतप्त सीताका विलाप करना २६- सीताका करुण-विलाप तथा अपने प्राणोंको त्याग देनेका निश्चय करना २७- त्रिजटाका स्वप्न, राक्षसोंके विनाश और श्रीरघुनाथजीकी विजयकी शुभ सूचना. २८- विलाप करती हुई सीताका प्राण-त्यागके लिये उद्यत होना २९- सीताजीके शुभ शकुन ३०- सीताजीसे वार्तालाप करनेके विषयमें हनुमान्जीका विचार करना ३१- हनुमान्जीका सीताको सुनानेके लिये श्रीराम-कथाका वर्णन करना ३२- सीताजीका तर्क-वितर्क ३३- सीताजीका हनुमान्जीको अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरणका वृत्तान्त बताना ३४- सीताजीका हनुमान्जीके प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान्जीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान ३५- सीताजीके पूछनेपर हनुमान्जीका श्रीरामके शारीरिक चिह्नों और गुणोंका वर्णन करना तथा नर-वानरकी मित्रताका प्रसङ्ग सुनाकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न करना ३६- हनुमान्जीका सीताको मुद्रिका देना, सीताका ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान्जीका श्रीरामके सीताविषयक प्रेमका वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना ३७- सीताका हनुमान्जीसे श्रीरामको शीघ्र बुलानेका आग्रह, हनुमान्जीका सीतासे अपने साथ चलनेका अनुरोध तथा सीताका अस्वीकार करना