श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें३८- सीताजीका हनुमान्जीको पहचानके रूपमें चित्रकूट पर्वतपर घटित हुए एक कौएके प्रसङ्गको सुनाना, भगवान् श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना ३९- चूड़ामणि लेकर जाते हुए हनुमान्जीसे सीताका श्रीराम आदिको उत्साहित करनेके लिये कहना तथा समुद्र-तरणके विषयमें शङ्कित हुई सीताको वानरोंका पराक्रम बताकर हनुमान्जीका आश्वासन देना ४०- सीताका श्रीरामसे कहनेके लिये पुनः संदेश देना तथा हनुमान्जीका उन्हें आश्वासन दे उत्तर दिशाकी ओर जाना ४१- हनुमान्जीके द्वारा प्रमदावन (अशोक-वाटिका)-का विध्वंस ४२- राक्षसियोंके मुखसे एक वानरके द्वारा प्रमदावनके विध्वंसका समाचार सुनकर रावणका किंकर नामक राक्षसोंको भेजना और हनुमान्जीके द्वारा उन सबका संहार ४३- हनुमान्जीके द्वारा चैत्यप्रासादका विध्वंस तथा उसके रक्षकोंका वध ४४- प्रहस्त-पुत्र जम्बुमालीका वध ४५- मन्त्रीके सात पुत्रोंका वध ४६- रावणके पाँच सेनापतियोंका वध ४७- रावणपुत्र अक्षकुमारका पराक्रम और वध ४८- इन्द्रजित् और हनुमान्जीका युद्ध, उसके दिव्यास्त्रके बन्धनमें बँधकर हनुमान्जीका रावणके दरबारमें उपस्थित होना ४९- रावणके प्रभावशाली स्वरूपको देखकर हनुमान्जीके मनमें अनेक प्रकारके विचारोंका उठना ५०- रावणका प्रहस्तके द्वारा हनुमान्जीसे लङ्कामें आनेका कारण पुछवाना और हनुमान्का अपनेको श्रीरामका दूत बताना. ५१- हनुमान्जीका श्रीरामके प्रभावका वर्णन करते हुए रावणको समझाना ५२- विभीषणका दूतके वधको अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देनेके लिये कहना तथा रावणका उनके अनुरोधको स्वीकार कर लेना ५३- राक्षसोंका हनुमान्जीकी पूँछमें आग लगाकर उन्हें नगरमें घुमाना ५४- लङ्कापुरीका दहन और राक्षसोंका विलाप ५५- सीताजीके लिये हनुमान्जीकी चिन्ता और उसका निवारण ५६- हनुमान्जीका पुनः सीताजीसे मिलकर लौटना और समुद्रको लाँघना