श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 539, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे बँधे हुए बछड़ेवाली सवत्सा गौ शामको घरकी ओर लौटते समय बछड़ेके स्नेहसे दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार श्रीरामकी माता कौसल्या उनकी ओर दौड़ी आ रही थीं॥ ४३ ॥
‘हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की रट लगाती और रोती हुईं कौसल्या उस रथके पीछे दौड़ रही थीं। वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये नेत्रोंसे आँसू बहा रही थीं एवं इधर-उधर नाचती—चक्कर लगाती-सी डोल रही थीं। इस अवस्थामें माता कौसल्याको श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार देखा॥ ४४-४५ ॥
राजा दशरथ चिल्लाकर कहते थे—‘सुमन्त्र! ठहरो।’ किंतु श्रीरामचन्द्रजी कहते थे—‘आगे बढ़िये, शीघ्र आगे बढ़िये।’ उन दो प्रकारके आदेशोंमें पड़े हुए बेचारे सुमन्त्रका मन उस समय दो पहियोंके बीचमें फँसे हुए मनुष्यका-सा हो रहा था॥ ४६ ॥
उस समय श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा—‘यहाँ अधिक विलम्ब करना मेरे और पिताजीके लिये दुःख ही नहीं, महान् दुःखका कारण होगा; इसलिये रथ आगे बढ़ाइये। लौटनेपर महाराज उलाहना दें तो कह दीजियेगा, मैंने आपकी बात नहीं सुनी’॥ ४७ ॥
अन्तमें श्रीरामके ही आदेशका पालन करते हुए सारथिने पीछेसे आनेवाले लोगोंसे जानेकी आज्ञा ली और स्वतः चलते हुए घोड़ोंको भी तीव्रगतिसे चलनेके लिये हाँका॥ ४८ ॥
राजा दशरथके साथ आनेवाले लोग मन-ही-मन श्रीरामकी परिक्रमा करके शरीरमात्रसे लौटे (मनसे नहीं लौटे); क्योंकि वह उनके रथकी अपेक्षा भी तीव्रगामी था। दूसरे मनुष्योंका समुदाय शीघ्रगामी मन और शरीर दोनोंसे ही नहीं लौटा (वे सब लोग श्रीरामके पीछे-पीछे दौड़े चले गये)॥ ४९ ॥
इधर मन्त्रियोंने महाराज दशरथसे कहा—‘राजन्! जिसके लिये यह इच्छा की जाय कि वह पुनः शीघ्र लौट आये, उसके पीछे दूरतक नहीं जाना चाहिये’॥ ५० ॥
सर्वगुणसम्पन्न राजा दशरथका शरीर पसीनेसे भीग रहा था। वे विषादके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते थे। अपने मन्त्रियोंकी उपर्युक्त बात सुनकर वे वहीं खड़े हो गये और रानियोंसहित अत्यन्त दीनभावसे पुत्रकी ओर देखने लगे॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥