श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंइकतालीसवाँ सर्ग
श्रीरामके वनगमनसे रनवासकी स्त्रियोंका विलाप तथा नगरनिवासियोंकी शोकाकुल अवस्था
पुरुषसिंह श्रीरामने माताओंसहित पिताके लिये दूरसे ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्थामें जब वे रथद्वारा नगरसे बाहर निकलने लगे, उस समय रनवासकी रानियोंमें बड़ा हाहाकार मच गया॥ १ ॥
वे रोती हुईं कहने लगीं—‘हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनोंकी गति (सब सुखोंकी प्राप्ति करानेवाले) और शरण (समस्त आपत्तियोंसे रक्षा करनेवाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करनेवाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं?॥ २ ॥
‘जो किसीके द्वारा झूठा कलंक लगाये जानेपर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलानेवाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगोंको मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरोंके दुःखमें समवेदना प्रकट करनेवाले राम कहाँ जा रहे हैं?॥ ३ ॥
‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं?॥ ४ ॥
‘कैकेयीके द्वारा क्लेशमें डाले गये महाराजके वन जानेके लिये कहनेपर हमलोगोंकी अथवा समस्त जगत्की रक्षा करनेवाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं?॥
‘अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीव-जगत्के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीरामको वनवासके लिये देशनिकाला दे रहे हैं’॥ ६ ॥
इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ोंसे बिछुड़ी हुईं गौओंकी तरह दुःखसे आर्त होकर रोने और उच्चस्वरसे क्रन्दन करने लगीं॥ ७ ॥
अन्तःपुरमें वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोकसे संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुःखी हो गये॥ ८ ॥
उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थोंके घर भोजन नहीं बना, प्रजाओंने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, हाथियोंने मुँहमें लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओंने