श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंबछड़ोंको दूध नहीं पिलाया और पहले-पहल पुत्रको जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई॥ ९-१० ॥
त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रातमें वक्रगतिसे चन्द्रमाके पास पहुँचकर दारुण (क्रूरकान्तियुक्त) होकर स्थित हो गये॥
नक्षत्रोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब-के-सब आकाशमें विपरीत मार्गपर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे॥ १२ ॥
आकाशमें छायी हुई मेघमाला वायुके वेगसे उमड़े हुए समुद्रके समान प्रतीत होती थी। श्रीरामके वनको जाते समय वह सारा नगर जोर-जोरसे हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया)॥ १३ ॥
समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार-सा छा गया। न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र॥
सहसा सारे नागरिक दीन-दशाको प्राप्त हो गये। किसीने भी आहार या विहारमें मन नहीं लगाया॥ १५ ॥
अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परासे संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथको कोसने लगे॥
सड़कपर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था। सबका मुख आँसुओंसे भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे॥ १७ ॥
शीतल वायु नहीं चलती थी। चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था। सूर्य भी जगत्को उचित मात्रामें ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था। सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था॥ १८ ॥
बालक माँ-बापको भूल गये। पतियोंको स्त्रियोंकी याद नहीं आती थी और भाई भाईका स्मरण नहीं करते थे—सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीरामका ही चिन्तन करने लगे॥ १९ ॥
जो श्रीरामके मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। शोकके भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे रातमें सोयेतक नहीं॥ २० ॥
इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीरामसे रहित होकर भय और शोकसे प्रज्वलित-सी होकर उसी प्रकार घोर हलचलमें पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्रसे रहित हुई मेरु-पर्वतसहित यह पृथ्वी