श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर शोकसे कातर हुई कौसल्या देवी उस समय धरतीपर लोटनेके कारण धूलसे व्याप्त हुए महाराजको उठाकर उनके साथ राजभवनकी ओर लौटीं॥ १० ॥
जैसे कोई जान-बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मणकी हत्या कर डाले अथवा हाथसे प्रज्वलित अग्निका स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदानके कारण वनमें गये हुए श्रीरामका चिन्तन करके अनुतप्त हो रहे थे॥ ११ ॥
राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथके मार्गोंपर देखनेका कष्ट उठाते थे। उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्यकी भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था॥ १२ ॥
वे अपने प्रिय पुत्रका बारंबार स्मरण करके दुःखसे आतुर हो विलाप करने लगे। वे बेटेको नगरकी सीमापर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे—॥ १३ ॥
‘हाय! मेरे पुत्रको वनकी ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाहनों (घोड़ों) के पदचिह्न तो मार्गमें दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीरामका दर्शन नहीं हो रहा है॥ १४ ॥
‘जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दनसे चर्चित हो तकियोंका सहारा लेकर उत्तम शय्याओंपर सुखसे सोते थे और उत्तम अलंकारोंसे विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्षकी जड़का आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थरको सिरके नीचे रखकर भूमिपर ही शयन करेंगे॥ १५-१६ ॥
‘फिर अङ्गोंमें धूल लपेटे दीनकी भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन-भूमिसे उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरनेके पाससे गजराज उठता है॥
‘निश्चय ही वनमें रहनेवाले मनुष्य लोकनाथ महाबाहु श्रीरामको वहाँसे अनाथकी भाँति उठकर जाते हुए देखेंगे॥ १८ ॥
‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह जनककी प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटोंपर पैर पड़नेसे व्यथाका अनुभव करती हुई वनको जायगी॥ १९ ॥
‘वह वनके कष्टोंसे अनभिज्ञ है। वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंका गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जन-तर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायगी॥ २० ॥
‘अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग। मैं पुरुषसिंह श्रीरामके बिना जीवित नहीं रह सकता’॥ २१ ॥