श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथने मरघटसे नहाकर आये हुए पुरुषकी भाँति मनुष्योंकी भारी भीड़से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवनमें प्रवेश किया॥ २२ ॥
उन्होंने देखा, अयोध्यापुरीके प्रत्येक घरका बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। (क्योंकि उन घरोंके सब लोग श्रीरामके पीछे चले गये थे।) बाजार-हाट बंद है। जो लोग नगरमें हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दुःखसे आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कोंपर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगरकी यह अवस्था देखकर श्रीरामके लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महलके भीतर गये, जैसे सूर्य मेघोंकी घटामें छिप जाते हैं॥ २३-२४ ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सीतासे रहित वह राजभवन उस महान् अक्षोभ्य जलाशयके समान जान पड़ता था, जिसके भीतरके नागको गरुड़ उठा ले गये हों॥ २५ ॥
उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथने गद्गद वाणीमें द्वारपालोंसे यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वरसे रहित बात कही— ॥ २६ ॥
‘मुझे शीघ्र ही श्रीराम-माता कौसल्याके घरमें पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदयको और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती’॥ २७ ॥
ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथको द्वारपालोंने बड़ी विनयके साथ रानी कौसल्याके भवनमें पहुँचाया और पलंगपर सुला दिया॥ २८ ॥
वहाँ कौसल्याके भवनमें प्रवेश करके पलंगपर आरूढ़ हो जानेपर भी राजा दशरथका मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा॥ २९ ॥
दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीतासे रहित वह भवन राजाको चन्द्रहीन आकाशकी भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा॥ ३० ॥
उसे देखकर पराक्रमी महाराजने एक बाँह ऊपर उठाकर उच्चस्वरसे विलाप करते हुए कहा—‘हा राम! तुम हम दोनों माता-पिताको त्याग दे रहे हो। जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षोंकी अवधितक जीवित रहेंगे और अयोध्यामें पुनः लौटे हुए श्रीरामको हृदयसे लगाकर देखेंगे, वे ही वास्तवमें सुखी होंगे’॥ ३१-३२ ॥
तदनन्तर अपनी कालरात्रिके समान वह रात्रि आनेपर राजा दशरथने आधी रात होनेपर कौसल्यासे इस प्रकार कहा— ॥ ३३ ॥