भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 63

पुनाति भुवनं पुण्या रामायणमहानदी॥ श्लोकसारसमाकीर्णं सर्गकल्लोलसंकुलम्। काण्डग्राहमहामीनां वन्दे रामायणार्णवम्॥

फिर देवता, ब्राह्मणादिकी पूजा कर पाठका संकल्प करके ऋष्यादिन्यास करे। अनुष्ठानप्रकाशके अनुसार कामनाभेदसे यदि पूरी रामायणका पाठ न हो सके तो अलग-अलग काण्डोंके अनुष्ठानकी भी विधि है। जैसे पुत्रकी कामनावाला बालकाण्ड पढ़े, लक्ष्मीकी इच्छावाला अयोध्याकाण्ड पढ़े। इसी प्रकार नष्टराज्यकी प्राप्तिकी इच्छावालोंको किष्किन्धाकाण्डका, सभी कामनाओंकी इच्छावालोंको सुन्दरकाण्डका और शत्रुनाशकी कामनावालोंको लङ्काकाण्डका पाठ करना चाहिये। ‘बृहद्धर्मपुराण’ के अनुसार इनका अन्य भी सकाम उपयोग है। वह तथा उसके न्यासादिका प्रकार आगे लिखा जायगा।

ॐ अस्य श्रीवाल्मीकिरामायणमहामन्त्रस्य भगवान् वाल्मीकिर्ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। श्रीरामः परमात्मा देवता। अभयं सर्वभूतेभ्य इति बीजम्। अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिति शक्तिः। एतदस्त्रबलं दिव्यमिति कीलकम्। भगवान्नारायणो देव इति तत्त्वम्। धर्मात्मा सत्यसंधश्चेत्यस्त्रम्। पुरुषार्थचतुष्टयसिद्धार्थे पाठे विनियोगः।

ॐ श्रीं रां आपदामपहर्तारमित्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ ह्रीं रीं दातारमिति तर्जनीभ्यां नमः। ॐ रों रूं सर्वसम्पदामिति मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ श्रीं रैं लोकाभिराममित्यनामिकाभ्यां नमः। ॐ श्रीं रौं श्रीराममिति कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

ॐ रौं रः भूयो भूयो नमाम्यहमिति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

इन्हीं मन्त्रोंसे इसी प्रकार हृदयादि³ न्यास करे। फिर—

ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपस्विनः। सिद्धिं दिशन्तु मे सर्वे देवाः सर्षिगणास्तिवह॥

—इति दिग्बन्धः।

यों कहकर चारों ओर हाथ घुमाकर अन्तमें फिर इस प्रकार ध्यान करे—

वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पश्चात् सुमित्रासुतः।