श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 658, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘सारथे! इससे प्रतीत होता है कि इस समय मेरे बान्धवोंको कुशल-मङ्गल सर्वथा दुर्लभ है, तभी तो मोहका कोई कारण न होनेपर भी मेरा हृदय बैठा जा रहा है’॥ ३१ ॥
भरत मन-ही-मन बहुत खिन्न थे। उनका हृदय शिथिल हो रहा था। वे डरे हुए थे और उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठी थीं, इसी अवस्थामें उन्होंने शीघ्रतापूर्वक इक्ष्वाकुवंशी राजाओंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया॥ ३२ ॥
पुरीके द्वारपर सदा वैजयन्ती पताका फहरानेके कारण उस द्वारका नाम वैजयन्त रखा गया था। (यह पुरीके पश्चिम भागमें था।) उस वैजयन्तद्वारसे भरत पुरीके भीतर प्रविष्ट हुए। उस समय उनके रथके घोड़े बहुत थके हुए थे। द्वारपालोंने उठकर कहा— ‘महाराजकी जय हो!’ फिर वे उनके साथ आगे बढ़े॥ ३३ ॥
भरतका हृदय एकाग्र नहीं था—वे घबराये हुए थे। अतः उन रघुकुलनन्दन भरतने साथ आये हुए द्वारपालोंको सत्कारपूर्वक लौटा दिया और केकयराज अश्वपतिके थके-माँदे सारथिसे वहाँ इस प्रकार कहा— ॥ ३४ ॥
‘निष्पाप सूत! मैं बिना कारण ही इतनी उतावलीके साथ क्यों बुलाया गया? इस बातका विचार करके मेरे हृदयमें अशुभकी आशङ्का होती है। मेरा दीनतारहित स्वभाव भी अपनी स्थितिसे भ्रष्ट-सा हो रहा है॥ ३५ ॥
‘सारथे! अबसे पहले मैंने राजाओंके विनाशके जैसे-जैसे लक्षण सुन रखे हैं, उन सभी लक्षणोंको आज मैं यहाँ देख रहा हूँ॥ ३६ ॥
‘मैं देखता हूँ—गृहस्थोंके घरोंमें झाडू नहीं लगी है। वे रूखे और श्रीहीन दिखायी देते हैं। इनकी किवाड़ें खुली हैं। इन घरोंमें बलिवैश्वदेवकर्म नहीं हो रहे हैं। ये धूपकी सुगन्धसे वञ्चित हैं। इनमें रहनेवाले कुटुम्बीजनोंको भोजन नहीं प्राप्त हुआ है तथा ये सारे गृह प्रभाहीन (उदास) दिखायी देते हैं। जान पड़ता है— इनमें लक्ष्मीका निवास नहीं है॥ ३७-३८ १/२ ॥
‘देवमन्दिर फूलोंसे सजे हुए नहीं दिखायी देते। इनके आँगन झाड़े-बुहारे नहीं गये हैं। ये मनुष्योंसे सूने हो रहे हैं, अतएव इनकी पहले-जैसी शोभा नहीं हो रही है॥ ३९ १/२ ॥
‘देवप्रतिमाओंकी पूजा बंद हो गयी है। यज्ञशालाओंमें यज्ञ नहीं हो रहे हैं। फूलों और मालाओंके बाजारमें आज बिकनेकी कोई वस्तुएँ नहीं शोभित हो रही हैं। यहाँ पहलेके समान