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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 659, कुल 2621 में से

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बनिये भी आज नहीं दिखायी देते हैं। चिन्तासे उनका हृदय उद्विग्न जान पड़ता है और अपना व्यापार नष्ट हो जानेके कारण वे संकुचित हो रहे हैं॥ ४०-४१ १/२ ॥

‘देवालयों तथा चैत्य (देव) वृक्षोंपर जिनका निवास है, वे पशु-पक्षी दीन दिखायी दे रहे हैं। मैं देखता हूँ, नगरके सभी स्त्री-पुरुषोंका मुख मलिन है, उनकी आँखोंमें आँसू भरे हैं और वे सब-के-सब दीन, चिन्तित, दुर्बल तथा उत्कण्ठित हैं’॥ ४२-४३ ॥

सारथिसे ऐसा कहकर अयोध्यामें होनेवाले उन अनिष्टसूचक चिह्नोंको देखते हुए भरत मन-ही-मन दुःखी हो राजमहलमें गये॥ ४४ ॥

जो अयोध्यापुरी कभी देवराज इन्द्रकी नगरीके समान शोभा पाती थी; उसीके चौराहे, घर और सड़कें आज सूनी दिखायी देती थीं तथा दरवाजोंकी किवाड़ें धूलि-धूसर हो रही थीं, उसकी ऐसी दुर्दशा देख भरत पूर्णतः दुःखमें निमग्न हो गये॥ ४५ ॥

उस नगरमें जो पहले कभी नहीं हुईं थीं, ऐसी अप्रिय बातोंको देखकर महात्मा भरतने अपना मस्तक नीचेको झुका लिया, उनका हर्ष छिन गया और उन्होंने दीन-हृदयसे पिताके भवनमें प्रवेश किया॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥


* अयोध्यासे जो पाँच दूत चले थे, वे सीधी राहसे राजगृहमें आये थे; अतः उनके मार्गमें जो-जो स्थान पड़े थे, वे भरतके मार्गमें नहीं पड़े थे। भरतके साथ रथ और चतुरङ्गिणी सेना थी, अतः उसके निर्वाहके अनुकूल मार्गसे चलकर वे अयोध्या पहुँचे थे। इसलिये इनके मार्गमें सर्वथा नये ग्रामों और स्थानोंका उल्लेख मिलता है।

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